नई दिल्ली: भारतीय सिनेमा का इतिहास केवल शानदार कहानियों और अभिनय तक सीमित नहीं है बल्कि इसके पीछे तकनीकी नवाचारों और संगीत की अद्भुत दुनिया छिपी हुई है। अस्सी के दशक की एक ऐसी ही कल्ट क्लासिक फिल्म ने दर्शकों के दिलों पर अपनी अमिट छाप छोड़ी थी। इस फिल्म में नायक के एक नकारात्मक और रहस्यमयी हमशक्ल पात्र के पर्दे पर आगमन के समय बजने वाले डरावने पार्श्व संगीत ने उस दौर में सिनेमाघरों में बैठे लोगों के रोंगटे खड़े कर दिए थे। दशकों तक इस विशिष्ट ध्वनि को लेकर फिल्म प्रेमियों के मन में कौतूहल बना रहा कि इसे किस आधुनिक वाद्य यंत्र या तकनीक से बनाया गया होगा। अब इस संगीत के पीछे की वास्तविकता सामने आई है जो यह स्पष्ट करती है कि एक महान कलाकार के लिए पूरी दुनिया ही संगीत का एक मंच है और वह साधारण वस्तुओं से भी असाधारण कला का सृजन कर सकता है।
फिल्म में जब उस खूंखार पात्र का प्रवेश होता है तो पृष्ठभूमि में एक अजीब सी गूंज और कंपन सुनाई देता है जो दर्शकों के मन में भय का संचार करता है। लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि यह किसी विदेशी तकनीक या महंगे सिंथेसाइज़र का परिणाम है। वास्तविकता यह है कि संगीत जगत के उस दिग्गज जादूगर ने इस भयावह प्रभाव को पैदा करने के लिए किसी पारंपरिक साज का सहारा नहीं लिया था। उन्होंने इस ध्वनि को उत्पन्न करने के लिए पानी के साथ गरारे करने की क्रिया का उपयोग किया था। संगीतकार ने गरारे करते समय निकलने वाली आवाज को रिकॉर्ड किया और फिर उसे अपनी संगीत समझ के साथ इस तरह ढाला कि वह सिनेमाई इतिहास का सबसे चर्चित और डरावना बैकग्राउंड स्कोर बन गया। यह प्रयोग उनकी उस मौलिक सोच को दर्शाता है जहां वे रोजमर्रा की ध्वनियों में भी संगीत ढूंढ लेते थे।
पंचम दा के नाम से मशहूर इस संगीतकार की यह विशेषता रही थी कि वे हमेशा लीक से हटकर सोचने के लिए जाने जाते थे। उन्होंने अपने करियर में कई बार कांच की बोतलों को टकराने रसोई के बर्तनों या फिर कागज फटने जैसी ध्वनियों को सुपरहिट गीतों का हिस्सा बनाया था। इस विशेष फिल्म के लिए उन्होंने गरारे की आवाज को इसलिए चुना क्योंकि वे उस नकारात्मक पात्र की क्रूरता और रहस्य को एक अलग पहचान देना चाहते थे। जब इस रचनात्मक रहस्य का खुलासा हुआ तो संगीत के जानकार भी हैरान रह गए। यह किस्सा आज भी फिल्म निर्माण की कक्षाओं में एक उदाहरण के रूप में सुनाया जाता है कि कैसे एक कलाकार अपनी कल्पनाशीलता के बल पर बहुत ही सीमित और साधारण संसाधनों से वैश्विक स्तर का प्रभाव पैदा कर सकता है।
उस समय के सिनेमा में अमिताभ बच्चन जैसे महानायक की उपस्थिति फिल्म के हर पक्ष से सर्वश्रेष्ठ की मांग करती थी। संगीतकार ने इस मांग को बखूबी समझा और न केवल मधुर गीतों की रचना की बल्कि पार्श्व संगीत के जरिए फिल्म के तनावपूर्ण दृश्यों में प्राण फूंक दिए। नायक के सौम्य व्यक्तित्व और उसके खतरनाक हमशक्ल के बीच का मानसिक द्वंद्व पर्दे पर स्पष्ट करने में इस डरावनी ध्वनि का बहुत बड़ा योगदान था। आज के आधुनिक दौर में जहां कंप्यूटर के जरिए लाखों तरह की ध्वनियां बनाई जा सकती हैं वहां अस्सी के दशक के ये मौलिक प्रयोग यह याद दिलाते हैं कि तकनीक केवल एक साधन है असली जादू तो कलाकार के मस्तिष्क और उसकी रचनात्मकता में होता है।
सिनेमा की यह विरासत हमें यह संदेश देती है कि महान कलाकृतियां केवल महंगे उपकरणों की मोहताज नहीं होतीं। कभी-कभी एक साधारण विचार और उपलब्ध संसाधनों का सही उपयोग ही इतिहास रचने के लिए काफी होता है। दशकों बीत जाने के बाद भी जब दर्शक उस फिल्म के उस विशेष दृश्य को देखते हैं तो वही पुराना रोमांच महसूस करते हैं। यह कहानी न केवल एक संगीतकार की सफलता को बयां करती है बल्कि भारतीय फिल्म संगीत के उस स्वर्णिम काल को भी समर्पित है जहां कलाकार नए-नए प्रयोगों से दर्शकों को आश्चर्यचकित करने का कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने देते थे।
