नई दिल्ली । भारत और पाकिस्तान के बीच साल 1999 में लड़ा गया कारगिल युद्ध न केवल सैन्य शौर्य बल्कि कूटनीतिक रणनीतियों के लिए भी जाना जाता है। इस युद्ध के दौरान पर्दे के पीछे का एक ऐसा ऐतिहासिक और बेहद चौंकाने वाला किस्सा सामने आया था, जब हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार ने देश के प्रति अपनी वफादारी निभाते हुए पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को फोन पर खरी-खरी सुना दी थी।
पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद कसूरी ने अपनी किताब ‘नाइदर ए हॉक नॉर ए डव’ में इस पूरे घटनाक्रम का विस्तार से जिक्र किया है। यह वाकया उस समय का है जब पाकिस्तानी सेना ने नियंत्रण रेखा पार कर भारतीय चौकियों पर चुपके से कब्जा कर लिया था और भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पाकिस्तान के इस धोखे से बेहद आहत थे, क्योंकि कुछ ही समय पहले वे शांति का पैगाम लेकर खुद बस से लाहौर गए थे।
किताब के अनुसार, एक दिन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ अपने कार्यालय में बैठे थे, तभी उनके एडीसी ने आकर सूचना दी कि भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी उनसे बेहद जरूरी बात करना चाहते हैं।
फोन लाइन कनेक्ट होते ही वाजपेयी जी ने बेहद तल्ख और निराश आवाज में नवाज शरीफ से सीधे सवाल किया कि मियाां साहब, एक तरफ आप लाहौर में मुझसे गर्मजोशी से गले मिल रहे थे और दूसरी तरफ आपकी सेना ने हमारे कारगिल पर कब्जा कर लिया, यह कैसी दोस्ती है। इस अचानक हुए सीधे हमले से नवाज शरीफ पूरी तरह सकपका गए और उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि उन्हें कारगिल की इस सैन्य कार्रवाई के बारे में पहले से कोई जानकारी नहीं थी और यह सब उनकी मर्जी के बिना हुआ है।
अटल बिहारी वाजपेयी ने नवाज शरीफ की इस सफाई पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया और अपनी कूटनीतिक रणनीति के तहत उनसे कहा कि अगर आपको मेरी बात पर यकीन नहीं हो रहा है, तो जरा उस शख्स से बात कीजिए जो इस वक्त मेरे पास ही बैठा है। इसके बाद वाजपेयी जी ने फोन की कमान बॉलीवुड के ‘ट्रैजेडी किंग’ कहे जाने वाले अभिनेता दिलीप कुमार के हाथों में सौंप दी।
जैसे ही फोन के दूसरी तरफ से दिलीप कुमार की आवाज गूंजी, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पूरी तरह दंग रह गए। चूंकि दिलीप कुमार का जन्म विभाजन से पहले पेशावर में हुआ था, इसलिए पाकिस्तान की आवाम और वहां के हुक्मरानों के बीच भी उनके प्रति बेहद सम्मान और गहरी दीवानगी थी।
फोन हाथ में लेते ही दिलीप कुमार ने बिना किसी संकोच के नवाज शरीफ को एक कड़ा और भावुक संदेश दिया। उन्होंने कहा कि मियाां साहब, हमें आपसे इस तरह के कदम की उम्मीद बिल्कुल नहीं थी क्योंकि आपने हमेशा भारत और पाकिस्तान के बीच शांति व्यवस्था बनाए रखने का दावा किया है।
उन्होंने आगे एक हिंदुस्तानी मुस्लिम के दर्द को बयां करते हुए कहा कि जब भी दोनों देशों के बीच सरहद पर तनाव बढ़ता है, तो भारत के मुस्लिम खुद को असुरक्षित महसूस करने लगते हैं और उनके लिए घरों से बाहर निकलना तक मुश्किल हो जाता है। दिलीप कुमार ने नवाज शरीफ से खुदा के वास्ते इस गंभीर स्थिति को संभालने और तुरंत कुछ ठोस कदम उठाने की अपील की।
हालांकि, इस ऐतिहासिक फोन कॉल के तुरंत बाद जमीनी स्तर पर युद्ध पूरी तरह तो नहीं रुका, लेकिन माना जाता है कि इससे कुछ समय के लिए कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज हुई और सीमा पर तनाव को समझने में मदद मिली। यह युद्ध पूरे तीन महीने तक जारी रहा, जिसमें भारतीय सेना ने अपने वीर जवानों की शहादत और अदम्य साहस की बदौलत कारगिल की चोटियों से दुश्मनों को खदेड़कर दोबारा तिरंगा फहराया था।
देश के प्रति दिलीप कुमार का यह जज्बा हमेशा से अटूट था, जिसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि साल 1947 में विभाजन के समय जब उनके परिवार को किसी ने पाकिस्तान लौटने की सलाह दी थी, तो उन्होंने दोटूक जवाब दिया था कि उनका वतन हिंदुस्तान ही है और वे यहीं जिएंगे और यहीं मरेंगे।