आत्माराम यादव पीव चीफ एडिटर
प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री-राज्य मंत्री, सांसद- विधायक , हे मुख्यमंत्री जी, हे सांसदों, हे विधायकों,पार्षदों- पंचों सरपंचों जी, मैं भारत का एक सामान्य सा आम नागरिक हूँ, ठीक उसी तरह जिस प्रकार कभी आप भी मेरी तरह आम हुआ करते थे? आप सिर झुकाकर, हरेक आम के पैरों में पड़कर आम से खास हो गए। खास होते ही आपके लिए आम रसीला हो गया ओर आप आम को चूसने लगे- काटकर खाने लगे। खास की खासियत है वह खास के लिए ही समर्पित होता है ओर वह जो कुछ भी करता है खास के लिए ही करता है, उसे आम आचार की तरह तीखा ओर स्वादिष्ट लगता है। हे राजनीति के पावरफूल स्तम्भ तुम अनंत शक्तिशाली हो मैं एक आम पत्रकार तुमको बार बार प्रणाम करता हूँ। राजनीति में आकार आप सभी खास अमरवेल की तरह अमर हो गए ओर मुझ आम की किस्मत को आप सभी खासो ने मिलकर उस प्रकार कर दिया जैसे रेलवे लाइनों के किनारे बोये बेशरम के पौधे ओर उसमें लगे पुष्प के होते है, जो दो कौड़ी का भी मूल्य नहीं पा सकता है। मुझे मूल्यहीन करने के बाद भी मैं बारंबार आपको प्रणाम करता हूँ, पर आप खास के ही प्रणाम स्वीकार करते है ओर मेरे प्रणामों को आप किसी बदचलन के बड़े पेट को गिराने जैसा ही कूड़े में गिरा देते हो। पता नहीं मुझ आम को कौन सा डर सताता है जो आप खास को प्रणाम करता हूँ, शायद मुझ आम को स्वार्थ ने जकड़ लिया है जो आप खास से प्रणाम का जबाव मिलते ही खुद को खास समझने पर फूला नहीं समाता हूँ, इसलिए जब आप आम के बीच भीड़ में हो या खास के बीच हो, मेरा मन इनकी मौजूदगी में आपके प्रणाम का उत्तर पाकर झूम उठता हूँ इसलिए आपको प्रणाम करने पहुच जाता हूँ किन्तु आप ठहरे राजनेता वह भी खास, इसलिए आप आम को जहां जैसे मिल जाये दबाकर-पिचकाकर उसकी ओर देखना भी नहीं चाहेंगे ओर तब मैं बिचारा आम आप खास के प्रणाम का उत्तर न मिलने पर अपने आम होने की पीड़ा लिए लौट जाऊंगा ?
जनपद में आप खास अपने एकन्नी चुअन्नी के साथ गपशप कर रहे थे, की मैं आम पत्रकार पहुँच गया ओर झट से प्रणाम किया, आधा एक मिनिट प्रणाम की मुद्रा में रहा किन्तु खास ने चर्चा जारी कर मुझे अनसुना अनदेखा कर चर्चा जारी रही तब तं मेरा प्रणाम उस कक्ष में बहता हुआ सभी की नजर में आ गया पर जिस खास को किया वह तो देखे ही नहीं, मैं अपने प्रणाम के प्रवाह को वही बहता छोड़कर आ गया। अक्सर मुझ आम के साथ कुछ खास यही करते है पर में भी उन्हे प्रणाम करना नही भूलता हूँ। मेरा प्रणाम उन तक पहुचना ही चाहिए। यहाँ के सभी खास सांसद हो या विधायक, उनसे आज तक खुद के लिए कभी कोई सिफ़ारिश नही कराई, खुद अपने आम होने के परिचय से ही मैं जीवन पथपर संघर्ष करता रहा हूँ, अभावों से उसी तरह रिश्ता है जैसे शरीर का मन से पर मन में उदासी –हताशा के लिए प्रवेश वर्जित रखा… ठीक वैसे ही जैसे यहा के खास मेरा प्रणाम वर्जित रखे है। मैं इन खास के पास कभी अपने निजी स्वार्थ के लिए प्रणाम लेकर नहीं पहुँचा हूँ ओर न ही जीवित रहते तक पहुचुंगा। हा समाज के लिए, शहर के हित में मैं आम पत्रकार सभी के पास अपने प्रणाम लेकर जाता रहूँगा … मैं अपने प्रणाम उनके दरबार में लेकर पहुँचूँगा …. जब तक वे प्रणाम स्वीकार नहीं करते प्रणाम के पहाड़ खड़ा करता रहूँगा। जैसे भूमि पर पड़ा-पड़ा पेड़ गल सढ़कर भूमि में मिलकर अपनी धरती माँ को सच्चा प्रणाम कर लेता है, ठीक वैसे ही मैं अपने आप को खाकर इन्हे प्रणाम करने को तैयार हूँ ताकि ये मेरे शहर को मेरी मातृभूमि को कुछ एसी उपलब्धि नही दे देते, जिसे इतिहास सदियों तक समरण कर उसका लाभ लेते रहे।
मुझ आम के लिए कलेक्टर भी खास है, पुलिस अधीक्षक भी खास है ओर प्रशासन में बैठे सारे अधिकारी ओर कर्मचारी भी खास है जिनके कंधों पर आम व्यक्ति के तमाम अधिकार, कानून व्यवस्था ओर न्याय की डोली होती है अगर वे चाहे तो इससे मुहमोड़कर इस डोली को अर्थी का रूप भी दे सकते है। तमाम दायित्वों का निष्ठा से निर्वहन करने वाले इन सभी को मेरा प्रणाम, वे मेरे प्रणाम स्वीकारे ओर जो अपने को कर्तव्य की कसौटी पर कायम नहीं रखता,उनके लिए मेरे प्रणाम नहीं है। जब जिले का अधिकारी गरीब-कमजोर ओर आम व्यक्ति के लिए सदा से सदा तक मौन रहना ही सीखा ले तब न्याय से वंचित ये आम आदमी अपने जीवन में मौत की सी शान्ति जीने को विवश होता है। जब इन आम व्यक्ति के शब्द और संकेत खास को सुनवाई के अवसर पर बिलकुल न भाए तो यह किसी अन्य खास के पक्ष में आम के साथ धोखा है जिसे रोज किसी तहसीलदार, अनुविभागीय अधिकारी, बिजली, बैंक, कृषि, सिंचाई विभाग आदि अंजाम दे रहा है। इनके साथ हुआ अन्याय, इन्हे होने वाले कष्ट, इनके परिवार में घटने वाले दुख के पहाड़ों की सूचना भले खास के पास नहीं पहुँच पाती हो पर आश्चर्य होता है की मानवीय भावनाओं में जानबूझकर गलत निर्णय लेने या देने के बाद भी इन खास का अन्तरतम उन्हे एकांत में झकझोरता नहीं? इन खास के भी परिवार होते है, जरूरी नहीं की सभी खास हो। उन आम परिवार का भी दर्द है, उनके लिए भले आप खास नहीं किन्तु भगवान उनके लिए बेहद खास है, वे भगवान के द्वार पर पहुँचते है प्रार्थना करते है दुआ देते है जिससे किस्मतों का फैसला होता है, अगर वे बद्दुआ दे दें तो क्या इससे किस्मत पर ग्रहण नहीं लगेगा? ये गलती करने वाले खास नहीं सोचते है। खास भूल जाते है की जब मृत्यु होगी तो बिना घाँस के आग पकड़ेगी नहीं।
खास आखिर कब तक खास रहेगा? 50 साल से देख रहा हूँ, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद,विधायक ये सभी कुर्सी पर सवार पदाधिकारी, कोई भी अब तक खास बना नहीं रहा, एक समय बाद ये आम ही हो गए है। कलेक्टर से बाबू तक मंत्रालय से सन्त्रालय अर्थात पुलिस चौकी तक कोई भी सदैव खास नहीं बना रहा, सब एक समय बाद आम हो गए। फिर जब आम ही बनना सबकी नियति है तब खास बने रहने पर इतनी अकड़ क्यो? हो सकता है बीते हुए जन्मों के प्रारब्ध से खास बने हो, किन्तु अगर इस जन्म के प्रारब्ध बिगाड़ोगे तो खास नहीं आम ही तो होना होगा। हर खास व्यक्ति, मुझ आम पत्रकार की इन बातों से मौनमुद्रा को न तोड़े या तर्क-कुतर्क की असफल चेष्टाए कर अपना पक्ष रखे पर क्या वे इसके योग्य है, वे खुद आत्मनिरीक्षण करके देख सकते है, उनकी अंतरात्मा से उत्तर मिल जाएगा। अभी आप जो खास है, उसके सामने मैं अभी कुछ हूँ भी नहीं, पत्रकार होना भी कुछ होना होता है, जब संपादक, चीफ एडिटर आप खास के दरबार के नगीने हो तो पत्रकार का आप खास के सामने क्या मूल्य है? आप खास बेहतर समझते है ओर वैसा ही व्यवहार करते है ओर हर आम तब आपसे अंत में हार मानकर बैठ जाता है, पर में हारकर भी बैठने वालों मे से नहीं हूँ, मैं हर बार हारने के बाद उतनी ही ताकत से खड़ा होकर प्रणाम करता हूँ, मुझे पता है आप मुझ आम का प्रणाम लेते नहीं पर मैं जबरिया आपको अपना प्रणाम देकर जीतना चाहता हूँ?
मैं आज हर उस खास को जिसको मेरी जरूरत नहीं है, उसे बोलना चाहता हूँ, जबकि मेरा मन बोलने की इजाजत नहीं देता फिर भी मन को मारकर बोल रहा हूँ। बोलने की जरूरत नहीं है पर बोलने का मतलब है, आप खास को भूल जाना, जैसे खास आम होने के बाद भूल जाने वाले है,किन्तु आप खास को भूले बिना बोलना कैसा ? ठीक वैसे ही जैसे देव को पूजना हो तो पहले देव ही बन जाओ, तमी उनका भजन हो सकता है। सो आज मैं भी आप खास ही की तरह मौन होकर – पूरा पूरा मौन होकर -पत्थर बनकर अपने मन को भी ‘चुप रह’ कहकर, आप खास के बेढंगे व्यक्तित्व के नीचे, अपने आपको रखकर, अपना सर्वस्व बलिदान करके, आपको प्रणाम करता हूँ और चाहता हूँ कि आप अपने इस झूठे अहंकार को कुचल दीजिये। जिस प्रकार जगदीश्वर से मुझ आम पत्रकार की खास बनने के लिए प्रार्थना के स्वर प्रस्फुटित होते है की है परमात्मा आप मुझ अनुभवहीन की लेखनी के अक्षरों में, ब्रह्माण्ड की प्रत्येक वस्तु पर, आप जो मौन सागर हैं, उसमें घुल जाने की, पूर्ण अनुमति लिखवा दीजिए । बस, मेरा जीवन सफल हो जायगा। भले विश्व मंच पर आप सभी खास विशेष को में बार बार, हजार बार, लाख बार प्रणाम निवेदित करू ओर वे मेरे प्रणाम को कोई आम पत्रकार बन खास के लिए इस आम से स्वादिष्ट अचार बनाकर स्वाद लेता रहे, मैं अपने अभिनय को मंचासीन करता रहूँगा… लिखता रहूँगा… ताकि अखबारों के दफ्तर प्रकाशन सामग्री न मिलने से कभी बंद न हो।
