देश के ज्वलंत मुद्दे को लेकर-
शहरनामा
“जंतर-मंतर की हुंकार और सत्ता की लाचारी”
आख़िरकार शिक्षा के सवाल पर उठी युवाओं की आवाज़ ने सत्ता के सबसे ऊँचे गलियारों तक दस्तक दे ही दी। जंतर-मंतर पर गूंजती हुंकार, सड़कों पर उमड़ा आक्रोश और शिक्षा व्यवस्था को लेकर उठते सवालों के बीच सरकार को ऐसा कदम उठाना पड़ा जिसकी कुछ दिन पहले तक कल्पना भी नहीं की जा रही थी। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक पड़ाव बन गया।
राजनीति में कहा जाता है कि कुर्सियाँ चुनाव जिताती हैं, लेकिन जनता का विश्वास सरकार बचाता है। जब विश्वास डगमगाने लगे तो सबसे पहले जवाबदेही की आहट सुनाई देती है। इस्तीफ़ा उसी आहट का संकेत माना जा रहा है।
युवाओं ने इस बार केवल परीक्षा, पेपर लीक या भर्ती की बात नहीं की, बल्कि व्यवस्था की जवाबदेही को कठघरे में खड़ा कर दिया। सत्ता ने पहले विरोध को नज़रअंदाज़ किया, फिर उसे नियंत्रित करने की कोशिश की, लेकिन जब आक्रोश थमा नहीं तो अंततः राजनीतिक क्षति को सीमित करने के लिए एक बड़ा निर्णय लेना पड़ा।
अब असली कहानी इस्तीफ़े के बाद शुरू होगी। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि अपने ही संगठन के भीतर उठने वाले सवाल हो सकते हैं। जब कोई बड़ा चेहरा हटता है तो दावेदार बढ़ जाते हैं और सलाहकारों की संख्या अचानक कई गुना हो जाती है। हर नेता स्वयं को संकटमोचक सिद्ध करने की होड़ में लग जाता है। ऐसे समय में बयानों की तलवारें अक्सर विपक्ष से पहले पार्टी के भीतर ही चलती हैं।
यह भी देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस बदलाव को केवल एक व्यक्ति की जिम्मेदारी तक सीमित रखती है या शिक्षा व्यवस्था में वास्तविक सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाती है। क्योंकि मंत्री बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती; व्यवस्था तब बदलती है जब नीयत और नीति दोनों बदलें।
जंतर-मंतर की यह लड़ाई एक और संदेश देकर गई है—युवा अब केवल सोशल मीडिया पर नाराज़गी दर्ज करने वाली पीढ़ी नहीं रहे। जब उनके भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगता है, तो वे लोकतांत्रिक तरीके से सड़क पर भी उतरते हैं और सत्ता को जवाब देने के लिए विवश भी कर देते हैं।
शहरनामा का निष्कर्ष यही है—
लोकतंत्र में जनता की आवाज़ देर से सुनाई दे सकती है, लेकिन यदि वह लगातार और संगठित रहे तो सत्ता के सबसे मजबूत दरवाज़े भी खुल जाते हैं। अब निगाहें इस पर हैं कि यह इस्तीफ़ा केवल एक राजनीतिक विराम साबित होगा या शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव की शुरुआत। समय इसका उत्तर देगा, लेकिन इतना तय है कि जंतर-मंतर की गूँज फिलहाल दिल्ली की सत्ता के गलियारों में लंबे समय तक सुनाई देती रहेगी
