आत्माराम यादव चीफ एडिटर हिन्द संतरी डाट काम
वह चीखना चाहता था पर शब्द उसके हलक से बाहर निकलने को तैयार नहीं थे। मैंने अपनी दृष्टि उसकी आँखों में गडा रखी थी ताकि उसके अटके शब्द उसकी आँखों की गहराई में पढ़ सकूँ । मौत को किसी ने देखा नहीं है, किन्तु मौत उसके सामने थी और वह यही मुझे बताना चाह रहा था । मैं अवाक था विस्मय से भरा यह कुतूहल मेरे समक्ष उपस्थित था जब मैं उसकी आँखों की गहराई में एक -एक तरंग, एक-एक भाव, एक- एक पीड़ा, एक-एक बेबशी और लाचारी को देख रहा था पर पर कुछ भी करने की ताकत मुझमे नही थी। बड़ी बेबश थी उसकी आँखे, जिसमें मौत तांडव कर उसके प्राणों को खीँच रही थी और मेरी पलके बिना झुके अपलक इस दृश्य की साक्षी थी। यह जीवन का पहला अवसर था जब लौकिक जगत में अलौकिकता आभास हो रही थी, उसकी चीख उसके शब्द मेरे कानों के पर्दों को छूते हुए कब मुझसे कोसों दूर हो गए यह मेरे लिए अपरा जगत की प्रथम अनुभूति थी। उसके शब्द शब्दातीत हो गए, उसकी मृत्यु से सतत संघर्ष समाप्त हो गया उसकी आँखों में मैंने देखा जैसे कोई स्याह काला कलूटा लुटेरा मुझसे छीनकर आकाश की और निकल पड़ा, मैंने उसकी आँखों से मौत को जाते देखा और आँखे सपाट खुली रह गई और उसके दोनों हाथ निस्तेज मेरी गोदी में जमीं को छूने लगे. इसके कुछ मिनिट पूर्व बात करते करते एक खून की फब्बरेदार उलटी करने के कुछ मिनिट बाद ही वह हम सभी को छोड़कर चला गया। मेरा मित्र, मेरा गुरु और मोहल्ले का प्यारा सा टेलर मास्टर जिसे सब प्यार से लालू पुकारते वह लालू उर्फ़ लाल बहादुर यादव अकस्मात 14 मई 1992 को खुद अपना दुश्मन बन गया और सबक्से नाता तोड़ गया।
लाल बहादुर अपनी तीनों बहनों के प्रति गहरा प्रेम और उनके भावी जीवन को खुशियों से भर देने की उत्कंठा लिए शुरू से दिन रात कठोर मेहनत करता था। सीधी और अत्यंत भोली माँ के मातृत्व सुख के प्रति वह नतमस्तक रहा, एक बड़ी उमर तक माँद्वारा गल्ले की दुकान पर रेजगारी करना उसे बहुत तकलीफ देता, जिसे उसने कुछ दिन पहले ही बंद किया था। अकेला बैठा वह गुनता रहता अपने जीवन के अभाव पक्ष की सीमा को तोड़कर शिखर पर पहुचने हेतु, उसका गुनना किसी हद तक पागलपन ही कहा जा सकता था, तर्क वितर्क में उसकी बुद्धि का कोई मुकावला करने वाला नही था ? पर कभी- कभी उसका अपने पिता के साथ तर्क उसकी नियति रही। उसका हर सपना अपने आप में एक पूर्ण जिम्मेदारी लिए अपने लक्ष्य को पाने की और अग्रसर था किन्तु कुछ रुकावटें थी जिसे व्यक्त उसने उचित नहीं समझा, एक यही स्वाभिमान उसे मौत की ख़ामोशी को चीरकर यमराज के क्रूर हाथों में सौंप आया। उसकी पहली जरूरत अच्छे मकान बनाने की रही दूसरी बहनों को खूब पढ़ा लिखाकर योग्य घरों में व्याहने की थी जिसे पह अपने जीवन काल में पूरा न कर सका।
आज ही के दिन 14 मई को सुबह झेलम एक्सप्रेस से दिल्ली जाने के लिए मैं अपने घर से 40 मिनट पूर्व निकला, मेरे घर से 200 कदम दूरी पर लालू का घर था और 1500 कदम की दूरी पर स्टेशन था सोचा रास्ते में लालू से आधा घंटा बात 10 मिनिट में स्टेशन पहुच जायूँगा. मैंने लालू के घर पटिये के गेट पर आवाज दी तो मुझे जबाव नही मिला ..छोटी बहिन एक कोने मैं खड़ी रो रही थी …मैंने पूछा तो बताया भैया अस्पताल मैं भर्ती है रात से उल्टियां हो रही है ..मैंने सामान्य गर्मी के कारण बीमार होने की सोचकर अपने घर अटेची रख स्कूटर उठाकर अस्पताल पहुंचे और ड्यूटी पर डॉ ए के तिवारी थे उनसे पूछा …तो उन्होंने मुझे कहा …क्या अभी तक तुम मरीज को लेकर भोपाल नहीं गए …मैंने तो रात को ही कह दिया था …मैंने कारण पूछा तो उन्होंने बताया की उसने जहर खा लिया है …मैं अवाक रह गया और दिल्ली की यात्रा निरस्त कर इसे भोपाल ले जाने की तैयारी की …उनके पिता चिंता दादा ने मना किया की पैसा कौन खर्च करेगा …मेरे पास अपने बेटे के इलाज के लिए पैसा नहीं है, और न ही मैं किसी से उधार लेकर कर्जदार बनना चाहता हूँ. .उसका यही सरकारी अस्पताल में इलाज होने दो, बच जाएगा तो मेरा भाग्य, नहीं बचा तो मेरा दुर्भाग्य? मैंने उन्हें आश्वस्त किया और डाक्टर से डिस्चार्ज करने को कहा इसी लिखा पढ़ी में ग्यारह बज चुके थे। किन्तु लालू की पिता चिंता दादा की चिंता पैसे को लेकर थी और वे मुझे रोकने का प्रयास करते रहे पर जब .मैंने कहा जितना पैसा लगेगा मैं दूंगा और और आपसे तकादा नहीं करूँगा तब उन्होंने लालू को भोपाल ले जाने की सहमति दी।
जैसे ही में लालू के पलंग के पास पहुंचा मैंने उसे डांटा, बुजदिल, धोखेबाज कम से कम बहनो की और देखता लेकिन एक छोटी सी मुस्कुराहट से उसने जवाब , मुझे नहाना है पुरे शरीर में आग लगी है। क्या नर्मदा स्नान कराने ले चलोगे, मैंने परिवार के सामने उससे भोपाल चलने को कहा, तुम स्वस्थ हो जाओ फिर नहाने चलेंगे? उस नाउम्मीद ने कोई जबाव नहीं दिया तब मैं गुस्से का अभिनय करते कहा पगले तेरा नाम लालबहादुर है, लाल बहादुर वह होता है जो मौत से लड़ जाए और जीने की जिद करे तो मौत की हस्ती मिटा दे। फिर क्या था बेहोशी में भी उसमे जोश भर गया और वह अस्पताल की सीढ़िया उतरकर नीचे आया जहा उसने कहा यार तेरी गोद मिल जाए तो जीने का मजा आ जाए, इतना क्रूर मजाक करना उसकी फितरत में था मैं उसे अपनी गोद में उठाये तांगे तक लाया। बसस्टेंड आने पर उसके पिता ने अपनी गोद का सहारा दिया और अपना दर्द पी गए, बस में पिता की गोद में लालू था, किन्तु गर्मी से सभी बेहाल थे और बस को चलने में 40 मिनिट थे तब तक बोनट की गर्मी भी कष्ट देने लगी थी और हवा नाममात्र के लिए भी नहीं चल रही थी।
लालू के पिताजी बोले गर्मी में मर रहे है घर ले चलो अभी भोपाल पहुँचने में 4 घन्टे लग जायेंगे । मैंने उनकी बात अनसुना कर कहा फ़िक्र क्यों करते हो लालू ठीक हो जाएगा पर उन्होंने पहली बार विश्वास किया और बेटे के स्वस्थ्य होने की उम्मीद जागी। मेरे पर्स में उस समय दिल्ली खर्च के पैसे थे ही लेकिन कुछ ज्यादा रखने का सोचकर में स्कूटर ले सतरास्ते पर वाइन्स की दुकान पर काम करने वाले मेरे किरायेदार भवानी सिंह चोहान के पास पंहुचा तो उन्होंने गल्ले से दो हजार रूपये दिए और अपनी दुकान का टेलीफोन नंबर देकर कहा अगर जरूरत हो तो बता दीजिये भोपाल में जहा होगा, जितना होगा पैसा पहुंचा दिया जाएगा। काफी प्रयास के बाद हमें एम्बुलेंस नही मिली और न ही कोई निजी वाहन मिला मज़बूरी में टाँगे में लालू को लिटा बसस्टेंड पंहुचा जहा राज्यपरिवहन की बस में लालू को साथ लिए मैं इनके पिता के साथ भोपाल रवाना हुआ । …मेरा लालबहादुर बहुत बैचैन था …रो रहा था ..उसकी पीड़ा देख मैं भी गुस्से को पीकर अन्दर ही अन्दर रो पड़ा किन्तु अपनी कमजोरी दोनों बाप बेटे के सामने उजागर नही होने दी। लालू जीना चाहता था पर सांसे ऊपरवाले के हाथो में थी हम सब लाचारी से उसे बेबश देख रहे थे। बस की तीन सीट में खिड़की की और उसके पिताजी बैठ गए बीच में लालू पिता की और पैर कर मेरी गोद में सिर रखे हुए था…मैं यात्रा के दरम्यान इसकी पीड़ा को देख देख कर अन्दर ही अन्दर टूट चूका था …लेकिन रो नहीं पा रहा था ।
बीती रात ही मैंने उससे आखिरी बार आधे घंटे तक दिल्ली यात्रा और उसके पिता द्वारा उसकी शादी तय किये जाने को लेकर बात की थी, आज अस्पताल से लेकर भोपाल रवाना होने तक उसके मुह के एक भी शब्द नहीं निकला था, किन्तु आँखों में आंसू की धार लगी थी शायद उसे अपने निर्णय पर पछतावा हो? वह पूरी ताकत लगाकर अपना मुहं खोलता और कुछ बोलना चाहता था किन्तु शब्द निकालने तक का सामर्थ वह न जुटा पाता। मैंने अनेक बार उसे पुकारा, हर बार उसकी आँखों में बैचनी के रंग बदलते दिखाई दिए मानो मृत्यु को आभासित कर वह उससे संघर्ष कर रहा हो। बस की सारी सवारी को खबर हो चुकी थी की ये लड़के ने जहर खाया है बस सभी की जुवान पर अच्छे बुरे संवाद की बरसात शुरू हो गई, कुछेक ने सहानुभूति जता उसके लिए जीवनदान मांगने भगवान से प्रार्थना शुरू कर दी। बुदनी, गडरिया नाला आदि पार कर हमारी बस बरखेडा के पहले आने वाले मोड़ तक पहुच गई थी। लालू मेरी गोद में था, वह बार बार अपने पिता की और देखता, गुस्सा करता, हँसता फिर रोने लगता। मैं उसके सिर पर हाथ फेरता, गाल पर थपकी देता और डपट लगाता नालायक जिन्दगी से यूँ ही कोई भागता है। लालू को उसके पिता ढाढस बंधाते की मैं अब कुछ नहीं कहूँगा, तुम्हे अगर शादी नहीं करनी है तो नहीं करूँगा और जो शादी के लिए शगुन लिया है उसे वापिस कर दूंगा। एक और पिता बेटे के सामने नतमस्तक हो रहे थे तो दूसरी और मृत्यु से संघर्ष कर रहे लालू के लिए मैं पूर्ण श्रद्धा के उस अलौकिक सत्ता के समक्ष समर्पित था और आत्मा की अनंत गहराइयों से परमात्मा से प्रार्थना कर उसके जीवन का दान चाह रहा था। यह अप्रत्याशित सी घटना बार-बार असत्य की भ्रान्ति से मन में लाती रही परन्तु हृदय सत्य की उपेक्षा करने से रहा। दूर क्षितिज तक कही भी कुछ नजर नही आ रहा था, आँखे आकाश में बादलों के स्वेत धवल रूप को बदलता देख रही थी। पर्वतराज क्षितिज के शिखर तक अपनी सीमा के गर्वित हो रहा था, गगन श्वेत नील सा छोटी सी काली बदली को लेकर पर्वतराज की ओट में उमड़ आया मानों लालू के दुःख में यह काली बदली भी भाव विह्वल हो अशुपुरित इस बेवशी पर क्रंदन करने को आतुर हो।
बस गन्तव्य की ओर तेजी से बढ़ रही थी, लालू ने एक खून की उलटी की जिसकी बदबू से बस में सवार सभी लोग घृणा से चीखे चिल्लाये और ड्रायवर को बस रोकने का कहा और बोले इन्हें यही जंगल में छोडो और ले चलो। बस खड़ा होने पर मैं यंत्रवत उतरा और रास्ते से धुल मिटटी उठकर उसकी उलटी को वही पेड़ के पत्तों से साफ की. बस में एक सुगन्धित अगरबत्ती का व्यापारी था उसने अपने पास अगरबत्ती जला कर हवा को सुगंधित किया, बस सभी सवारी बदबू से बचने के लिए हाथों में अगरबत्ती लिए थी। थोड़ी देर पहले जो मानवता प्रकट कर रहे थे वे सारे व्यक्ति एक दम अमानवीय हो गए, संभवतया उनके मनों के भीतर मृत्यु भय अथवा महामारी उन्हें लगने की संदिग्ध संकीर्ण वैचारिकता ने जकड़ लिया था। कोई साथ देने को तत्पर नहीं तब ज्ञात हुआ कि मोह्बंधन कितना प्रगाढ़ होता है चाहे यह स्वय के जीवन के प्रति हो अथवा अपने संबन्धियों के प्रति। कितनी दुखद होती है बैचेनी, मैं देख सकता था काश सभी की ह्रदय से श्रद्धा मिली होती या सभी यात्री अनन्य भाव से परमसत्ता के प्रति करुणादान की अनुनय करते तो अवश्यंभावी मृत्य लौट गई होती क्योकि परमसत्ता किंचितमात्र भी इस एक स्वर करुणानय की वृहद् शक्ति को अनसुना न करती ।
लालू के हाथों का बंधन मेरे कंधो पर कसता गया और मेरे हाथ उसकी कलाई की नब्ज को टटोलने के लिए मजबूत पकड़ बनाये हुए थे कि उसकी नाडी की धड़कन धीमी होती गई । असहनीय पीडा लालू के उदर में विस्फोट करती दिखी और वह मूर्छावस्था में पहुँच गया और अपने एक हाथ के नाख़ून से पेट को चीर देने को उतारू हो गया, और उसने पूरी ताकत से पेट को खुरचना चाहा मैंने उसका हाथ मजबूती से रोक लिया गई तभी तो उसने पूरी ताकत लगाकर उठने का प्रयास कर आँखे खोलना चाही लेकिन मूर्छा उसे उससे दूर करती गई पर उसका प्रयास जारी था और बंद हुई उसकी शून्यवत आँखे बड़ी मुश्किल से खुली जैसे एक पल में सारी त्रुटियों के लिए क्षमा चाहते हुए जीवन के मोह में फसना चाहती थी यानी वह जीना चाहता था। जीवन के प्रति मोहग्रस्त हुई इन आँखें का अपना कोई वश नहीं था साँसे धीमी होती गई मुँह से कुछ शब्द फूटे जो अस्पष्ट थे बस आँखों से गरम आसुओ का आखिरी फब्बारा गालों से बह निकला, साथ ही एक काली छाया पलक झपकते आकाश के बादलों को चीर कर जाती दिखी। मेरे हाथों ने आभासित किया जो आँखो ने देखा था, लालू की मेरी गोद में मृत्यु हो चुकी थी अपने जीवन का पहला जाग्रत मृत्यु आगमन, जिसमें शने शने ! नाड़ी धीमी होती गई और मैं हाथों को कसता गया इस उम्मीद के कहीं में भ्रमित तो नहीं । मुझे विश्वास ही नही कि एक ऐसा विस्मयकारी खेल चलेगा और मौत आकर चली जायेगी।
लालबहादुरयादव आज भी मेरी स्मृति पटल पर जिन्दा है, अपने समय का होनहार, दर्शनशास्त्र का तार्किक बुद्धिमान और कुशल टेलरमास्टर ग्वालटोली होशंगाबाद में निवास करने वाला वह कम उम्र में बड़े-बड़े ज्ञानियों से तर्कशास्त्र करता और लोगों का जमावड़ा उसके पास लगा रहता जिसे उसके पिता चिन्ता यादव को बिलकुल पसंद नहीं था। एक छोटी सी झुग्गी में अपनी तीन बहनों और माता पिता के साथ जीवन यापन करने लालू के पिता चिंता यादव किसी समय इस क्षेत्र में सायकल बेचने और किराये से देने की बहुत बड़ी दुकान के मालिक थे और ग्वालटोली के जो पुराने सायकल दुकान संचालक है वे उनकी दुकान पर काम सीखकर अपनी पहचान बनाये हुए है. कालान्तर में इस व्यापार में चिंता यादव को घाटा हुआ तो उन्होंने होटल खोल ली जिसमें भी उनका नाम और फायदा हुआ पर उनकी गलतियों के कारण वे घाटा उठाकर पैसे पैसे को तरस गए और एक हाथ ठेला लेकर हम्माली करने लगे. अलवत्ता लालू ने टेलरिंग की दुकान खोल ली और अपने पिता को हम्माली से रोकने लगा जबकि उस समय उसकी माँ गल्ला व्यापारी के यहाँ गेहूं साफ़ कर महीने में 300 रूपये लाती जो पिता को पसंद था किन्तु बेटा लालू दोनों की मजदूरी बंद कराकर सुख से रखना चाहता था. उसी समय मैंने लालू की दुकान में टेलरिंग का काम सीखा और पेंट शर्ट स्पेशलिस्ट बन गया, लालू जैसा गुरु पाकर मैं अपने को एक अच्छे टेलरमास्टर के रूप में देखना चाहता था किन्तु लालू की मौत के बाद मैंने सिलाई मशीन धागा सुई से नाता तोड़ लिया और टेलरिंग काम को सदा के लिए विदा कर दिया, लालू की मौत ने मुझे अन्दर तक झकझोर दिया और समाज में गरीबी से तंग आकर कोई जीवन से नाता तोड़ ले, यह अब भी मेरे लिए नागवार बात है, मैं जीवन की अंतिम सांस तक संघर्ष पर विश्वास करता हूँ, लालू भी करता था, पर वह कमजोर होकर मौत को गले लगा लेगा यह मेरे लिए यकीन करने वाली बात नहीं थी,किन्तु सत्य तो यही था.
हाँ लालू शरणागत ही था, इसलिए जीते जी अपना हाथ इस उम्मीद के साथ मुझे थमाया कि मैं उसे प्रश्रय दे सकू पर अनर्थ में मूक बना उसकी शरणागत को समझ कर भी न समझ सका । अपना जीवन हाथो से जाते देख यह बिलखा था उसकी हर सांस पश्चाताप की रहीं । उमंगें उसके जीवन में बौराय आम की तरह थी, माझी की तरह न थकने वाले हाथों से हर तूफानों को लांघकर नौका पार लगाने का कर्तव्य उसमे कूट कूट भरा था किन्तु अचानक ही कमजोर हुआ हो ऐसा नहीं, घर के नकारात्मक वातावरण के साथ गरीबी उसे कचोटती थी और पिता का व्यवहार बहुत ही चिड़चिड़ा होने के साथ कर्कश था जो हर बात के साथ गाली गलौज करते थे जिसे सहन करने का संयम लालू को चुना था, परिणाम स्वरूप उसने रात को भोजन करने से पूर्व 1 बजे जहर खा लिया जबकि रात 11 बजे तक वह दुकान पर कपडे सीते हुए रसेंद्रिया जिव्हा के दमन और सौन्दर्य से वंचितों की चर्चा में उसके चेहरे पर उग आई फुंसियों के कारण लोगों की धारणाओं पर बहस कर रहा था , संभवत जिस परिवार में उसकी सगाई की बात चल रही थी, उस परिवार की किसी महिला सदस्य द्वारा उसके चेहरे की बदसूरती पर कटाक्ष से भी टूट चूका था रही सही कसर उसके पिता ने उसे अपमानित कर कर दी और हर जंग को जीतने का दम भरने वाला लालबहादुर अपनी जिन्दगी की जंग हार गया था।
लालू का शरीर हमारे पास था और आत्मा किसी अनजान लोक में चली गई हो। शरीर जो अब मिट्टी हो गया उसके पिता की गोद में था मैंने ड्राइवर को बस रोकने को कहा, बरखेडा बस्ती के बाहर ही बस रुकी तब मैंने हम दोनों ने शव को उतारा। लालू के पिता जी की आंखों में आंसू नहीं थे वे बोले लालू सो गया है, मैं जानता था वह कभी नहीं उठेगा. तब तक दिन के डेढ़ बज गए थे, नीम के पेड़ के नीचे लालू के शव को जमी बुहारकर एक चादर पर लिटा दिया जहा अनेक लोग उपस्थित हो गए। लोगों की भीड़ ने लालू के पिता को एहसास करा दिया कि उसका इकलौता पुत्र और उनके खानदान का चिराग बुझ गया है। मैंने पास ही बरखेडा पुलिस चौकी जाकर मदद की बात की तो उपस्थित हवलदार बोला चुपचाप शव को होशंगाबाद ले जाओ नहीं तो अभी कंट्रोलरूम से मदद मागेंगे तो शव को रायसेन जिला पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया जाएगा जो अगले दिन मिलेगा, मैं तुरंत ही वहा से लालू के शव के पास आ गया।
बरखेडा में अनेक परिचित और समाज के लोग आये, जिनके पास खुद के वाहन थे किन्तु शव के लिए उन्होंने वाहन की मदद करने से इंकार कर दिया। तब एक मुश्लिम ने अपना ट्रक खड़ा कर मदद की और हमें और लालू के शव को होशंगाबाद छोड़ा, जब ड्रायवर को पैसा देने की पेशकस की तो उन्होंने लेने से मना कर दिया। ग्वालटोली के हरेक व्यक्ति को लालू की मौत का पता चल चूका था किन्तु वहा भी कोई मदद के लिए वाहन लेकर नहीं आया तब लाचारी में लालू के पिता अपने घर जाकर हाथ ठेला लेकर आये जिसपर लालू को घर की और लेकर निकले तब कुछ लोगों ने कहा पुलिस केश है बिना पोस्टमार्टम के अंतिम संस्कार कैसे किया जा सकेगा। हाथ ठेले से शव को जिला चिकित्सालय लेकर पहुंचे तब डॉक्टरों का कहना था हम भोपाल के लिए रिलीव कर चुके है, मौत बरखेड़ा में हुई इसलिए पोस्टमार्टम वे ही करेंगे, तब की स्थिति में समाज के कुछ युवा लालू के शव ले घर लाये जहा से शाम पांच बजे श्मशान घाट रवाना हुये और शाम सात बजे सूर्यास्त के साथ लाल बहादुर के अन्त्येष्टि से उठते धुएं और आग के तादात्म्य में जीवन की विदाई कर चिंता दादा की चिंता लालू की चिता की परिक्रमा कर घर लौटे, लालू के असमय मौत के बाद उसके घर, उसकी बहनों के जीवन में आज भी एक गहरा सन्नाटा पसरा हुआ है ।
आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
श्री जगन्नाथ धाम काली मंदिर के पीछे ग्वालटोली
नर्मदापुरम मध्यप्रदेश मोबाईल 9993376616
