सरकार के दूसरे कार्यकाल में इस कानून को विशेष प्राथमिकता दी गई थी। लंबे समय से इस पर मंथन चल रहा था और कैबिनेट स्तर पर मंजूरी मिलने के बाद आखिरकार इसे विधानसभा के सामने रखा गया। सरकार का दावा है कि इस कानून का उद्देश्य नागरिक जीवन से जुड़े विभिन्न नियमों में समानता स्थापित करना और समाज में मौजूद कुछ पुरानी व्यवस्थाओं को नए कानूनी ढांचे के अनुरूप ढालना है। हालांकि इस फैसले के सामने आते ही विपक्ष ने इसे जल्दबाजी में लिया गया निर्णय बताया और व्यापक चर्चा की मांग उठाई।
विपक्षी दलों का कहना है कि इतने महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाले कानून पर राज्य के विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और अन्य संबंधित समूहों से विस्तृत बातचीत की जानी चाहिए थी। उनका मानना है कि समाज के अलग-अलग वर्गों की राय शामिल किए बिना ऐसे बड़े कानून को लागू करना उचित नहीं माना जा सकता। इसी मुद्दे को लेकर सदन के भीतर तीखी बहस और विरोध का माहौल देखने को मिला। राजनीतिक गलियारों में भी इस फैसले को लेकर चर्चाएं लगातार तेज हो गई हैं।
इस विधेयक की सबसे महत्वपूर्ण बात यह मानी जा रही है कि राज्य के मूल निवासी और आदिवासी समाज को इसके दायरे से बाहर रखा गया है। असम की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को ध्यान में रखते हुए सरकार ने यह कदम उठाया है। माना जा रहा है कि इस फैसले के जरिए राज्य के पारंपरिक ढांचे और जनजातीय पहचान को सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया है। सामाजिक संतुलन बनाए रखने की दिशा में इसे एक रणनीतिक कदम के रूप में भी देखा जा रहा है।
विधेयक में कई महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल किए गए हैं जिनका सीधा संबंध नागरिक जीवन से है। इसमें बहुविवाह जैसी प्रथाओं पर रोक, विवाह के लिए समान कानूनी आयु, शादियों और तलाक के अनिवार्य पंजीकरण, महिलाओं को पैतृक संपत्ति में बराबरी के अधिकार और लिव-इन संबंधों के लिए कानूनी प्रावधान जैसे विषय शामिल बताए जा रहे हैं। सरकार इसे समाज में समानता और पारदर्शिता बढ़ाने वाला कदम बता रही है।
फिलहाल पूरे देश की नजरें अब इस विधेयक की आगामी प्रक्रिया पर टिकी हुई हैं। आने वाले दिनों में सदन के भीतर इस पर चर्चा और राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है। यह स्पष्ट है कि असम का यह कदम केवल एक राज्य तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले समय में राष्ट्रीय स्तर पर भी इस विषय पर नई बहस को जन्म दे सकता है।
