होर्मुज बना संकट का ‘गला दबाने वाला पॉइंट’
बिरोल ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को इस पूरे संकट का सबसे बड़ा कारण बताया। यह वही समुद्री रास्ता है, जहां से दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20% गुजरता है। मौजूदा युद्ध के चलते यहां आपूर्ति बाधित है, जिससे तेल, गैस और अन्य जरूरी संसाधनों की वैश्विक सप्लाई पर असर पड़ रहा है।
उन्होंने साफ कहा—अगर यह मार्ग जल्द नहीं खुला, तो यह “अब तक का सबसे बड़ा ऊर्जा संकट” साबित हो सकता है।
यूरोप में ईंधन की किल्लत, दुनिया पर असर
IEA प्रमुख के मुताबिक, यूरोप में जेट ईंधन की कमी सबसे पहले नजर आएगी।
फ्लाइट्स रद्द होने लगेंगी
पेट्रोल, गैस और बिजली महंगी होगी
सप्लाई चेन प्रभावित होगी
इसका सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा—महंगाई बढ़ेगी और विकास दर धीमी पड़ सकती है।
गरीब देशों पर सबसे ज्यादा मार
बिरोल ने चेताया कि इस संकट का असर सभी देशों पर पड़ेगा, लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों को झेलना पड़ेगा।
उनके मुताबिक,
आर्थिक नुकसान असमान होगा
कमजोर अर्थव्यवस्थाएं ज्यादा प्रभावित होंगी
कुछ देशों में मंदी तक की स्थिति बन सकती है
‘टोल बूथ’ सिस्टम पर आपत्ति
ईरान द्वारा होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क (टोल) लगाने की कोशिश पर भी बिरोल ने कड़ी आपत्ति जताई।
टैंकर फंसे, उत्पादन ठप
फारस की खाड़ी में 110+ तेल टैंकर और 15+ LNG जहाज फंसे हुए हैं
युद्ध में 80 से ज्यादा ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रभावित
उत्पादन सामान्य होने में कई महीने, पूरी रिकवरी में 2 साल तक लग सकते हैं
आगे क्या?
बिरोल के अनुसार, अगर मई के अंत तक हालात नहीं सुधरे, तो दुनिया को
ऊंची महंगाई
धीमी आर्थिक वृद्धि
और संभावित मंदी
का सामना करना पड़ सकता है।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यह संकट भविष्य में परमाणु ऊर्जा और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर दुनिया को तेजी से मोड़ सकता है।
ऊर्जा और भू-राजनीति का यह टकराव अब पूरी दुनिया को अपनी चपेट में लेता दिख रहा है। अगर होर्मुज स्ट्रेट जल्द नहीं खुला, तो आने वाले हफ्तों में इसका असर सीधे लोगों की जेब और यात्रा दोनों पर दिखेगा।
