अमेरिका के इस कदम के जवाब में चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने पहली बार अपने ‘ब्लॉकिंग स्टैच्यूट’ का इस्तेमाल किया है। यह एक ऐसा कानूनी प्रावधान है, जिसके जरिए चीन विदेशी प्रतिबंधों को अपने देश में लागू होने से रोकता है। इस आदेश के तहत चीनी कंपनियों को साफ कहा गया है कि वे अमेरिकी प्रतिबंधों को नजरअंदाज करें और अपने व्यापारिक हितों को जारी रखें।
दरअसल, अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के तहत Office of Foreign Assets Control (OFAC) ने जिन कंपनियों पर कार्रवाई की है, उन्हें “स्पेशली डिज़िग्नेटेड नेशनल्स” (SDN) सूची में शामिल किया गया है। इस सूची में आने के बाद इन कंपनियों की अमेरिकी संपत्तियां फ्रीज की जा सकती हैं और वैश्विक वित्तीय लेन-देन पर भी असर पड़ता है।
जिन प्रमुख कंपनियों को इस विवाद के केंद्र में माना जा रहा है, उनमें हेंगली पेट्रोकेमिकल (डालियान), शेडोंग लुकिंग, जिनचेंग पेट्रोकेमिकल, हेबेई शिनहाई और शेंगशिंग केमिकल शामिल हैं। अमेरिका का आरोप है कि ये कंपनियां ईरान से कच्चा तेल खरीदकर उसके ऊर्जा क्षेत्र को आर्थिक समर्थन दे रही हैं।
चीन ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए अमेरिकी कदम को ‘एकतरफा प्रतिबंध’ बताया है। वाणिज्य मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों और वैश्विक व्यवस्था के खिलाफ है। चीन का यह भी कहना है कि संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी के बिना लगाए गए प्रतिबंध वैध नहीं माने जा सकते।
इस पूरे विवाद में शेडोंग प्रांत की तथाकथित ‘टीपॉट रिफाइनरियां’ भी चर्चा में हैं। ये छोटी लेकिन प्रभावशाली स्वतंत्र रिफाइनरियां हैं, जो वैश्विक तेल बाजार में अहम भूमिका निभाती हैं। अमेरिका का मानना है कि ये इकाइयां ईरानी तेल के आयात और प्रोसेसिंग में बड़ी भूमिका निभा रही हैं, जिससे प्रतिबंधों का असर कमजोर पड़ रहा है।
गौरतलब है कि ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध लंबे समय से लागू हैं और इनका उद्देश्य उसके तेल निर्यात को सीमित करना है। लेकिन चीन जैसे बड़े खरीदार देशों की भूमिका इस रणनीति को चुनौती देती रही है। ऐसे में यह ताजा टकराव सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, कूटनीति और वैश्विक शक्ति संतुलन से भी जुड़ा हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन द्वारा ‘ब्लॉकिंग स्टैच्यूट’ का इस्तेमाल यह संकेत देता है कि वह अब अमेरिकी दबाव के सामने झुकने के बजाय कानूनी और रणनीतिक तरीके से जवाब देने को तैयार है। आने वाले समय में यह विवाद वैश्विक बाजारों और तेल कीमतों पर भी असर डाल सकता है।
