नई दिल्ली। शनिवार का दिन न्याय और कर्मफल के देवता शनिदेव को समर्पित माना जाता है। यही कारण है कि इस दिन से जुड़ी कई धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताएं प्रचलित हैं। इन्हीं में से एक मान्यता यह भी है कि शनिवार को घर में तेल या लोहे की वस्तुएं नहीं लानी चाहिए। वर्षों से लोग इस नियम का पालन करते आ रहे हैं, लेकिन कई लोग इसे केवल अंधविश्वास मानते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर शनिवार को तेल खरीदने से क्यों मना किया जाता है और इसके पीछे क्या ज्योतिषीय कारण बताए गए हैं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार तेल को शनिदेव की प्रिय वस्तुओं में शामिल माना गया है। विशेष रूप से सरसों का तेल शनिदेव को अर्पित किया जाता है और शनिवार के दिन तेल दान करने की परंपरा भी प्रचलित है। मान्यता है कि शनिवार को तेल का दान करने से शनि दोष शांत होता है और व्यक्ति को शनि के अशुभ प्रभावों से राहत मिलती है। इसी वजह से कई विद्वान इस दिन तेल खरीदकर घर लाने से बचने की सलाह देते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति शनिवार को तेल घर लेकर आता है तो इसे प्रतीकात्मक रूप से “शनि को घर लाना” माना जाता है। कहा जाता है कि जिन लोगों की कुंडली में शनि अशुभ स्थिति में हो, साढ़ेसाती या ढैय्या चल रही हो, उनके लिए यह स्थिति नकारात्मक प्रभाव बढ़ा सकती है। ऐसे लोगों को शनिवार के दिन तेल खरीदने की बजाय तेल का दान करना अधिक शुभ माना गया है।
हालांकि ज्योतिषाचार्यों का यह भी कहना है कि यह नियम हर व्यक्ति पर समान रूप से लागू नहीं होता। जिन लोगों की जन्मकुंडली में शनि मजबूत स्थिति में हो, जैसे शनि उच्च राशि, स्वराशि या मूल त्रिकोण में स्थित हो, अथवा शनि शुभ भाव का स्वामी बनकर लाभकारी स्थिति में बैठा हो, उनके लिए शनिवार को तेल खरीदना अशुभ नहीं माना जाता। ऐसे लोग इस नियम के अपवाद माने जाते हैं।
ज्योतिष विशेषज्ञों के अनुसार, जिन लोगों पर शनि की अशुभ दृष्टि हो या जो शनि पीड़ा से गुजर रहे हों, उन्हें शनिवार को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। ऐसे लोगों को शनिवार के दिन पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाने और जरूरतमंदों को तेल दान करने की सलाह दी जाती है। माना जाता है कि इससे शनि का नकारात्मक प्रभाव कम होता है और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होने लगती हैं।
धार्मिक परंपराओं में कई नियम प्रतीकात्मक और आस्था से जुड़े होते हैं। इसलिए शनिवार को तेल खरीदने या न खरीदने का निर्णय व्यक्ति की आस्था, कुंडली की स्थिति और पारिवारिक मान्यताओं पर भी निर्भर करता है।
