चंद्रप्रकाश गुप्ता बताते हैं कि उनकी पत्नी पिछले तीन वर्षों से दोबारा चारधाम यात्रा पर जाने की जिद कर रही थीं। पहले भी दोनों यात्रा कर चुके थे, लेकिन निर्मला का कहना था कि अब वहां काफी बदलाव हो चुके हैं और एक बार फिर दर्शन करना चाहती हैं। यात्रा की तैयारी पूरी थी और ट्रेन की कन्फर्म टिकट भी मिल चुकी थी, लेकिन सुविधा को देखते हुए बस से जाने का फैसला किया गया। आज उन्हें सबसे ज्यादा यही बात सालती है कि अगर उस दिन बस नहीं पकड़ी होती तो शायद उनकी पत्नी आज उनके साथ होती।
हरिद्वार से लौटते समय बस पकड़ने के लिए दोनों ने काफी मशक्कत की। पहले गलत बस स्टैंड पहुंचे, फिर सामान उठाकर कई सौ मीटर पैदल चलना पड़ा। कई बार बस संचालक से संपर्क किया और आखिरकार इंदौर जाने वाली बस मिल गई। उस समय उन्हें लगा कि बस छूटने से बच गए, लेकिन उन्हें क्या पता था कि यही बस निर्मला की आखिरी यात्रा साबित होगी।
बस में बैठने के बाद निर्मला बेहद खुश थीं। उन्होंने बच्चों से फोन पर बात की और सोशल मीडिया पर ‘यात्रा पूरी’ का स्टेटस लगाया। इंदौर लौटने के बाद विदिशा, वृंदावन, सांवरिया सेठ और कुलदेवी के दर्शन की भी योजना बना ली गई थी। परिवार के साथ आने वाले दिनों की बातें हो रही थीं, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
रात करीब ढाई बजे तेज धमाके के साथ बस आगे चल रहे ट्रेलर से टकरा गई। टक्कर इतनी भीषण थी कि ऊपर की बर्थ पर सो रहे यात्री नीचे गिर पड़े और कुछ ही पलों में बस में अफरा-तफरी मच गई। चंद्रप्रकाश बताते हैं कि उनकी पत्नी खिड़की की तरफ सो रही थीं और उसी दिशा से ट्रेलर बस के अंदर तक घुस आया। उन्होंने कई बार पत्नी को आवाज दी, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।
उन्होंने किसी तरह पत्नी का फंसा हुआ पैर निकाला और उन्हें बाहर लाने की कोशिश की, लेकिन तभी किसी ने उन्हें जबरदस्ती बस से बाहर खींच लिया। कुछ ही क्षणों में बस आग की लपटों में घिर गई। वे दोबारा पत्नी को बचाने दौड़े, लेकिन आग इतनी तेजी से फैल चुकी थी कि अंदर जाना असंभव हो गया। उनकी आंखों के सामने ड्राइवर भी स्टीयरिंग में फंसा रह गया और जिंदा जल गया।
चंद्रप्रकाश कहते हैं कि हादसे के बाद के वे सात-आठ मिनट उनकी पूरी जिंदगी बदल देने वाले थे। मोबाइल, सामान और जीवनसाथी—सब कुछ एक साथ छिन गया। सबसे ज्यादा पीड़ा इस बात की रही कि आसपास मौजूद कई लोग वीडियो बनाते रहे, लेकिन मदद के लिए बहुत कम लोग आगे आए। आखिरकार एक युवक ने उन्हें अपना मोबाइल दिया, जिससे उन्होंने बेटे को फोन कर सिर्फ इतना कहा—”बहुत बड़ा हादसा हो गया है।”
करीब 44 वर्षों तक साथ निभाने वाली निर्मला गुप्ता को याद करते हुए उनकी आंखें भर आती हैं। वे बताते हैं कि बच्चों की पढ़ाई से लेकर परिवार की हर जिम्मेदारी उन्होंने पूरी निष्ठा से निभाई। तीनों बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने और जीवन में आगे बढ़ाने में उनका सबसे बड़ा योगदान था। सरल स्वभाव, सादगी और परिवार के प्रति समर्पण ही उनकी पहचान थी।
आज चंद्रप्रकाश गुप्ता के लिए चारधाम यात्रा की यादें आस्था से ज्यादा एक ऐसे दर्द की कहानी बन चुकी हैं, जिसने कुछ ही मिनटों में उनका पूरा संसार बदल दिया। उनके शब्दों में, “हम घर लौट रहे थे… लेकिन एक पल में सब खत्म हो गया।”
