रिपोर्ट में देशभर में मौजूदा 543 लोकसभा सीटों को बढ़ाकर 824 करने और बड़े संसदीय क्षेत्रों को दो या तीन हिस्सों में विभाजित करने की सिफारिश की गई है। इसी आधार पर मध्य प्रदेश में लगभग 52 प्रतिशत सीटें बढ़ने की संभावना जताई गई है। यदि भविष्य में इस दिशा में फैसला होता है तो राज्य के चुनावी और राजनीतिक समीकरणों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार भविष्य का परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। इसके लिए मतदाताओं की संख्या, भौगोलिक क्षेत्रफल, शहरीकरण, अनुसूचित जाति और जनजाति की आबादी, सामाजिक और भाषाई विविधता तथा मतदान प्रतिशत जैसे कई मानकों को भी महत्व देने का सुझाव दिया गया है। परिषद का मानना है कि इससे सांसद और मतदाताओं के बीच संपर्क बेहतर होगा तथा निर्वाचन क्षेत्रों का संतुलित विकास संभव हो सकेगा।
सबसे अधिक असर भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर, उज्जैन, सागर, रीवा और छिंदवाड़ा जैसे बड़े संसदीय क्षेत्रों पर पड़ सकता है। इन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है और शहरी विस्तार भी तेजी से हो रहा है। वहीं नए जिले मैहर, मऊगंज और पांढुर्णा भी भविष्य के परिसीमन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
रिपोर्ट में मालवा-निमाड़ और महाकौशल क्षेत्रों में सबसे अधिक बदलाव की संभावना जताई गई है। मालवा-निमाड़ की मौजूदा नौ लोकसभा सीटों में इंदौर, उज्जैन, धार और खरगोन जैसे बड़े क्षेत्रों का विभाजन कर सीटों की संख्या 13 तक पहुंच सकती है। इसी तरह महाकौशल क्षेत्र की छिंदवाड़ा, जबलपुर, मंडला और बालाघाट जैसी सीटों का पुनर्गठन कर यहां लोकसभा सीटों की संख्या चार से बढ़ाकर आठ किए जाने की संभावना बताई गई है।
यदि मध्य प्रदेश में लोकसभा सीटों की संख्या 44 होती है तो राष्ट्रीय राजनीति में राज्य की भूमिका और प्रभाव दोनों बढ़ेंगे। संसद में अधिक प्रतिनिधित्व मिलने के साथ केंद्र सरकार में राज्य की भागीदारी भी मजबूत हो सकती है। वहीं राजनीतिक दलों को नए परिसीमन के अनुसार संगठनात्मक ढांचे और चुनावी रणनीति में व्यापक बदलाव करने पड़ सकते हैं क्योंकि कई संसदीय क्षेत्रों की सीमाएं बदल जाएंगी।
रिपोर्ट के विश्लेषण के अनुसार नए परिसीमन की स्थिति में भोपाल, इंदौर, नागदा, बीना, ग्वालियर शहर, सीहोर, मऊगंज और लांजी जैसे क्षेत्रों में भाजपा की स्थिति मजबूत रह सकती है। वहीं पांढुर्णा, सरदारपुर, बड़वानी, डिंडौरी और उमरिया जैसे क्षेत्रों में कांग्रेस को नए अवसर मिल सकते हैं। हालांकि यह केवल अध्ययन आधारित आकलन है और अंतिम निर्णय भविष्य में होने वाले आधिकारिक परिसीमन पर निर्भर करेगा।
