नीलेश यादव जिला ब्यूरो
नर्मदापुरम 02 अगस्त 2026 (हिन्द संतरी ) लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की पूरी इमारत जिस मूल भावना पर टिकी है, वह है जनता का न्याय व्यवस्था और उसके संरक्षकों पर अटूट विश्वास। किसी भी जिले में कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट का पद केवल प्रशासनिक अधिकारों का प्रतीक नहीं, बल्कि वह आम जनमानस, शोषितों, किसानों और पीड़ितों के लिए ‘अन्नदाता, रक्षक और अंतिम न्यायदाता’ का स्वरूप होता है। जब एक साधारण नागरिक अपने जीवन के तमाम रास्ते बंद पाता है, जब वह हर चौखट से निराश लौटता है, तब वह पूरे आत्म-समर्पण और असीम आस्था के साथ जिलाधीश के दरबार में दस्तक देता है। जनसुनवाई की परिकल्पना भी इसी पवित्र भाव से उपजी थी कि आम नागरिक को लंबी और पेचीदा कानूनी गलियों में न भटकना पड़े और उसे अपने ही जिले के शीर्ष अभिभावक से त्वरित, पारदर्शी और निष्पक्ष न्याय प्राप्त हो सके। जिले की जनता आज भी अपने कलेक्टर महोदय को ईश्वर का ही एक प्रतिनिधि मानकर उनके हर शब्द और हर आदेश को सर्वोपरि मानती है।
परंतु, जब इसी सर्वोच्च प्रशासनिक पीठ से जारी किए गए जांच निर्देशों और न्याय के आदेशों को निचले स्तर का तंत्र ठंडे बस्ते में डाल देता है, तो एक बहुत ही पीड़ादायक स्थिति उत्पन्न होती है। हाल ही में जिले की विभिन्न ग्राम पंचायतों से सामने आए प्रामाणिक दस्तावेज़ और निष्पक्ष पत्रकारिता की रिपोर्टें मैदानी धरातल की एक ऐसी ही विचलित करने वाली तस्वीर बयां करती हैं। ग्राम पंचायत नाहरकोला का प्रकरण इस बात का एक ज्वलंत और प्रत्यक्ष उदाहरण है कि अतीत में समय पर कार्यवाही न होने के कितने गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हैं। नाहरकोला में सत्रह लाख रुपये से अधिक के कथित वित्तीय घोटाले की चीख-पुकार और शिकायतें पूर्व में ही जनपद, जिला पंचायत और कलेक्टर कार्यालय की दहलीज तक पहुँचाई गई थीं, किंतु समय रहते ठोस व दंडात्मक कदम न उठाए जाने का ही दुष्परिणाम रहा कि संबंधित जिम्मेदार व्यक्ति जनधन की भारी क्षति पहुँचाते हुए सकुशल सेवानिवृत्त हो गए। यदि उस समय शीर्ष स्तर के निर्देशों का तत्परता से पालन हुआ होता, तो राष्ट्र की इस आर्थिक संपत्ति को लुटने से बचाया जा सकता था।
यह शिथिलता केवल अतीत तक सीमित नहीं रही, बल्कि वर्तमान में भी अपने पैर पसारे हुए है। ग्राम पंचायत ढाबाकलां के प्रकरण में पत्रकार दयाराम कुशवाहा एवं स्थानीय ग्रामवासियों की सजगता से जनसुनवाई में शिकायत दर्ज कराई गई, जिसकी जांच में मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत के कारण बताओ पत्र के अनुसार ₹2,51,797/- की शासकीय राशि के गबन और कूटरचित दस्तावेजों की आधिकारिक पुष्टि तक हो चुकी है। किंतु जांच में गबन साबित होने के महीनों बाद भी एफआईआर, दंडात्मक कार्यवाही और राशि की रिकवरी में होती देरी यह सोचने पर विवश करती है कि आखिर निचले स्तर पर फाइलें क्यों थम जाती हैं। ठीक इसी प्रकार ग्राम पंचायत घाटली में पत्रकार देवेंद्र सिंह यादव द्वारा प्रस्तुत औपचारिक विधिक नोटिस और भारतीय साक्ष्य अधिनियम तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत समय-सीमा में जांच की मांग हो, या फिर उनके व अन्य सजग नागरिकों द्वारा पूर्व में दी गई दर्जनों अन्य शिकायतें—इन समस्त आवेदनों पर आज तक कोई ठोस और परिणामकारक कार्यवाही न होना एक गहरे सन्नाटे को जन्म देता है।
इन तमाम प्रकरणों का निष्पक्ष और गंभीर विश्लेषण करने पर एक ऐसा तार्किक और यक्ष प्रश्न खड़ा होता है, जो हर संवेदनशील नागरिक के मन को मथ देता है। यदि जिले के सबसे शक्तिशाली, सर्वगुण संपन्न और प्रशासनिक व्यवस्था के शीर्ष पद पर विराजमान माननीय कलेक्टर महोदय ने जनसुनवाई में इन शिकायतों पर संज्ञान लिया और जांच के निर्देश जारी किए, तो निचले स्तर के अधिकारियों में इतनी हिम्मत कहाँ से आई कि वे अपने ही जिलाधीश के आदेशों को नजरअंदाज कर दें? किसी भी भारतीय राज्य में एक आईएएस अधिकारी और जिला मजिस्ट्रेट के आदेश का उल्लंघन करना कोई साधारण बात नहीं है, यह प्रशासनिक अनुशासन की नींव पर चोट करने जैसा है। ऐसे में केवल दो ही स्थितियां संभव दिखती हैं—या तो निचले स्तर का अमला शीर्ष कार्यालय के आदेशों की पूरी तरह अवहेलना कर रहा है और कलेक्टर महोदय के इकबाल को चुनौती दे रहा है, या फिर शीर्ष स्तर से दी गई हिदायतों के बाद निचले तंत्र पर वह कठोर प्रशासनिक दबाव और मॉनिटरिंग नहीं बन पा रही है, जिसकी आवश्यकता ऐसे मामलों में होती है।
यदि जिलाधीश जैसे शक्तिशाली पद के आदेशों की भी निचले स्तर पर यही दुर्गति होती रही, तो फिर आम नागरिक न्याय की उम्मीद लेकर कहाँ जाएगा? यदि शीर्ष अधिकारी के निर्देशों की कोई वैल्यू ही नहीं बचेगी, तो जनसुनवाई जैसी पवित्र व्यवस्था केवल एक औपचारिक कागजी प्रक्रिया बनकर रह जाएगी। ऐसी स्थिति में विवश होकर फरियादियों को लोकायुक्त, ईओडब्ल्यू, शासन या माननीय उच्च न्यायालय का रुख करना पड़ता है। लेकिन एक जिम्मेदार पत्रकारिता और जागरूक नागरिक समाज का ध्येय कभी यह नहीं होता कि जिले की बात बाहर जाए। हमारी मंशा तो केवल यह है कि समस्याओं का समाधान जिला स्तर पर ही हो, आम नागरिकों को भटकना न पड़े और हमारे जिले के प्रशासनिक इकबाल और साख पर कभी कोई आंच न आए।
यह आलेख किसी भी अधिकारी पर आक्षेप लगाने या उनकी नीयत पर सवाल उठाने के लिए नहीं, बल्कि माननीय कलेक्टर महोदय की महान न्यायप्रियता, उनकी कार्यकुशलता और उनकी प्रशासनिक क्षमता में अपना अटूट और पवित्र विश्वास प्रकट करने के लिए लिखा गया है। जिले की जनता को आज भी अपने कलेक्टर महोदय की नीयत पर रत्ती भर भी संदेह नहीं है। जनता मानती है कि वे न्याय के देवता हैं और किसी भी दोषी को बख्शेंगे नहीं। अतः संपूर्ण जिले के नागरिकों और पत्रकारों की ओर से माननीय जिलाधीश महोदय से यह विनीत और भावुक अपील है कि वे नाहरकोला के अतीत से सीख लेते हुए, ढाबाकलां, घाटली और जनसुनवाई की दर्जनों लंबित फाइलों पर स्वतः संज्ञान लें। वे अपने उसी असीम पावर और कठोर प्रशासनिक चाबुक का प्रयोग करते हुए निचले तंत्र की मनमानी को ध्वस्त करें, दोषियों पर समय-सीमा में एफआईआर और रिकवरी की कार्यवाही सुनिश्चित कराएं, ताकि जनता का यह विश्वास और अधिक मजबूत हो सके कि जिले में न्याय अभी जिंदा है
