आत्माराम यादव चीफ एडिटर
नर्मदापुरम 28 अगस्त 2026 (हिन्द संतरी ) सेठानी घाट माँ नर्मदा की पावन गोद में आज धर्माचार्य पंडित सोमेश परसाई जी के सानिध्य में श्रावणी पर्व पर ब्राह्मणों ने यज्ञोपवीत के त्रिगुणित महत्व को आत्मसात करते हुये आत्मज्ञान के पवित्र धार्मिक अनुष्ठान को सम्पन्न किया। नर्मदा में स्नान कर दस विधि स्नान की परंपरा का पालन करते हुये गुरुदेव ने हेमाद्रि संकल्प लेने से पूर्व संबोधित करते हुये कहा परमात्मा के साथ मनुष्य ऐकात्म्यका अनुभव करें, उसके साथ अपने आप को एकाकार समझे, यही आत्मज्ञान है।यज्ञोपवीत धारण करने या उसके नवीनीकर्ण के समय जो संकल्प करना होता है वह यही आत्मज्ञान है।

धर्माचार्य गुरुदेव महाराज के अनुसार यज्ञोपवीत में त्रिगुणित किये हुये तीन तरह का शास़्त्रोक्त संकेत मिलते है- ततः प्रदक्षिणावर्त समस्यान्नवसूत्रकम्। त्रिरावेष्टय दृढ बदध्वा ब्रहविष्ण्वीश्वरान्नमेत।। अर्थात यज्ञोपवीत के नौ तारों को तीन-तीन करके अलग अलग बट लेना चाहिये, बाद में तीनों को इकट्टा करके उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलयकर्ता परमेश्वर का स्मरण करते हुये एक दृढ़ गाॅठ जिसे ब्रम्हग्रन्थि कहते है, बाॅधनी चाहिये। यज्ञोपवीत के तीन तारों को मिलाने के लिये जो ब्रम्हम्ग्रन्थि की गाॅठ लगायी जाती है वह त्रित्वात्मक संसार के ब्रम्ह में एकात्मभाव का प्रतीक है। त्रित्व की तीन अवस्थाओं का समाहार या समन्वय चतुर्थ किंव तुरीय अवस्था में ब्रम्हग्रन्थि में जाकर होता हैं यह तुरीय अवस्था ही पारमार्थिक स्थिति है, व्यवावहारिक जगत में विद्यमान त्रत इसी की अभिव्यक्ति अथवा रूपान्तरण है। व्यवहार के त्रित्व का विवेकपूर्वक समन्वयय करके तुरीय पदार्थ में एकात्म्यका साक्षात्कार करना परमार्थ, मोक्ष या चरम उद्देश्य है अर्थात तुरीय की ओर कदम बढ़ाना हैं। अपनी आत्मा को पहचानना, संकीर्ण वैयक्कितक आत्मा से उठकर सर्वव्यापक, नित्य, सर्वाधार और उच्चतर परम आत्मा का अनुभव करना ही मनुष्य का चरम ध्येय है। यज्ञोपवीत इसी ध्येय का प्रतीक है, यज्ञोपवीत मनुष्य के अन्दर निगूढ विश्वात्मा अथवा पिण्डब्रम्हाड के एक आत्मा की ओर संकेत करता है।
सुबह नगर के ब्राह्मण एवं अन्य सामाजिक नागरिक मा नर्मदा के तट पर पहुंचे। विधि-विधान से स्नान किया। दस विधि स्नान में दूध, दही, घी, गोबर, गोमूत्र, मिट्टी, भस्म, कुशा और हल्दी सहित विभिन्न पदार्थों का उपयोग किया गया। परम पूज्य गुरुदेव द्वारा बताया कि यह स्नान आत्मशुद्धि और जाने-अनजाने में हुए पापों के प्रायश्चित का प्रतीक माना जाता है। इसे श्रावणी उपाकर्म भी कहा जाता है। दस विधि स्नान के बाद हेमाद्रि संकल्प, तर्पण, यज्ञोपवीत का नवीनीकरण और ऋषि पूजन सहित विभिन्न धार्मिक कर्मकांड संपन्न किए गए।
