आत्माराम यादव चीफ एडिटर
नर्मदापुरम 02 अक्टूम्बर 2026 (हिन्द संतरी ) समाज का ढांचा चरमरा चुका है, हर तीज त्योहार पर पुजा पाठ में हजारों की भीड़ सिर्फ भीड़ ही है ओर भीड़ के आयोजक नेतागण है जो अपनी वोटबैंक की चिंता में फ्री का चन्दन लगाकर काली कमाई मे मस्त है। नेताओं के साथ अब धर्मगुरु भी इनकी राजनीति को चमकाने आने लगे है, कलेक्टर तक अब शिव जी की कावर लेकर इन नेताओं के पिछलग्गू बन चलने लगे ओर धर्म का रंग चढ़ाने के लिए हर मोहल्ले -हर घर मे पीली,केसरिया साड़ी ओर कुर्ते पार्षदों-सरपंचों ओर इनके प्रतिनिधों द्वारा बांटकर लाखों भक्तो की केसरिया रंग के कपड़ों मे देखने का दावा पूरा किया जाये तो यह सब संख्याए शिवभक्ति का लेशमात्र भी अंश नहीं बन पाती है यदि बनती तो समाज का ढांचा बिखरा नहीं होता ओर लोगो के घरों मे भक्ति से सुख शांति के स्थान पर तनाब नहीं होता।
सोचिए आज घरों में इतनी भक्ति पुजा पाठ के बाद घरों में नर्क जैसे हालात क्यो है, हर जगह नकारात्मक्ता क्यों है, पुजा पाठ से तो मन शांत होना चाहिए घर मे, समाज मे, व्यक्ति मे सकारात्मकता होना चाहिए लेकिन नहीं है, ओर परिवार मे तनाव है, दुख है लोग रिश्तों से दुखी है रिश्तो को तोड़ने के लिए परिवार तक होम करने को तैयार है फिर आपके धर्मगुरु ओर धर्म क्या कर रहा है ? आप हजारो की संख्या मे गणेश जी, दुर्गा जी काली जी बैठा रहे है, लाखो लोग शिव का डमरू लिए है, लाखो लोग कृष्ण जन्माष्टमी मना रहे है , दीवाली दशहरा होली मना रहे है क्या कारण है की इसमें खुशियों नदारत है?
शांतिनगर निवासी धनराज पारदी की पत्नी केशुबाई परिवार में पति के साथ हुई चर्चा से नाराज होकर दिनांक 01.10.2026 के रात्रि 10:00 बजे घर से दो बच्चे 05 वर्ष एवं 07 वर्ष तथा उसके भाई की बेटी उम्र 11 वर्ष को लेकर चली गई थी जिसे निरीक्षक उषा मरावी ने टीम बनाकर साइबर सेल और सीसीटीवी कैमरों की मदद से 2 घंटे के भीतर महिला और तीनों बच्चों को इटारसी रेलवे स्टेशन से सकुशल लाकर उस परिवार की मिला दिया, पर क्या इस परिवार ने जो त्रासदी महिला बच्चो ओर पति ई उसके परिवार ने झेली है उसपर समाज का चिंतन जाग्रत होगा , शायद नहीं ? यह एक मोहल्ले के एक घर की घटना है, विचार कीजिये क्या परिवार के रिश्तों में दरक लिए परिवारों -घरों में कमी है , शायद नहीं? हमारे धर्म गुरु , हमारे धर्माचार्य सभी धर्म की पताका लिए धर्म को अन्तरिक्ष मे स्थापित करने की होड मे है कोई भी समाज मे, समझ के घरो मे परिवार मे धर्म को स्थान नही देना चाहता है, धर्म के नाम पर जो आमदनी हो रही है, जो लक्ष्मी की वर्षा हो रही है वह सभी लूट रहे है , समाज भी इस लालच के चक्रव्यूह मे फसा है ओर गलत मार्ग के रास्तों का अनुगामी हो गया है इसलिए घरो पर परिवारों मे यह सब चलेगा । ज्ञातव्य रहे वासना के वशीभूत होकर एक नौकरीपेशा महिला ने अपनी नन्ही से प्यारी बिटिया को ट्रेन के आगे धकेलकर मौत का हवाले किया किन्तु भूल गई की कर्मफल पीछा नहीं छोडता ओर अब जेल मे है , धर्माचार्य ओर धर्मगुरु समाज को उन्नत बनाए जरूर किन्तु मन की शांति ओर सुख भी उन्हे मिले यह देशना न भूले , तभी इस प्रकार की घटनाओं पर रोक लग सकेगी।
