राजनीति में विपक्ष में बैठकर सत्ता को आईना दिखाना अपेक्षाकृत आसान है। असली परीक्षा तब होती है, जब सवाल अपने ही गठबंधन की सरकार से पूछा जाना हो और सामने अपने ही सहयोगी दल का मुख्यमंत्री हो।
झारखंड में राहुल गांधी ने इसी कठिन परीक्षा में एक ऐसा कदम उठाया है, जिसकी तारीफ केवल राजनीतिक चश्मे से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के चश्मे से भी की जानी चाहिए।
झारखंड में JPSC-JSSC भर्ती परीक्षाओं को लेकर छात्र लंबे समय से आंदोलनरत थे। राहुल गांधी ने अपने सहयोगी और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर साफ कहा कि छात्रों का आंदोलन शांतिपूर्ण है और उनकी मांगों को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। उन्होंने हेमंत सोरेन से स्वयं प्रदर्शनकारी छात्रों से मिलने और समाधान निकालने का आग्रह किया।
यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कांग्रेस झारखंड की सत्ता में साझेदार है।
यानी राहुल गांधी के सामने दो रास्ते थे—पहला, गठबंधन की राजनीतिक मजबूरियों को देखते हुए चुप रहना; दूसरा, युवाओं के सवाल को युवाओं का सवाल मानकर अपनी ही सरकार से जवाब मांगना।
उन्होंने दूसरा रास्ता चुना।
यही राजनीति और लोकतंत्र के बीच का फर्क है।
सत्ता किसी भी दल की हो, छात्र यदि रोजगार, भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता और अपने भविष्य को लेकर सड़क पर उतरते हैं तो उन्हें केवल “विरोधी” या “राजनीतिक साजिश” के चश्मे से देखना लोकतंत्र को छोटा करना है।
युवा कोई वोट बैंक नहीं हैं।
वे इस देश का भविष्य हैं—और जब भविष्य सवाल पूछता है तो सत्ता का पहला धर्म उसे चुप कराना नहीं, उसकी बात सुनना होना चाहिए।
राहुल गांधी की पहल का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि सत्ता में साझेदारी का अर्थ सरकार की हर गलती पर पर्दा डालना नहीं होता। गठबंधन धर्म अपनी जगह है और जनधर्म अपनी जगह। यदि दोनों के बीच कभी टकराव हो जाए तो लोकतंत्र में जनधर्म को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
और शायद इसी कारण यह प्रसंग सत्ता के हर केंद्र के लिए एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी है।
आज देश के अलग-अलग हिस्सों में युवा प्रतियोगी परीक्षाओं, भर्ती प्रक्रियाओं, पेपर लीक, परीक्षा की पारदर्शिता और रोजगार के अवसरों को लेकर बेचैन हैं। उनके हाथ में डिग्रियां हैं, आंखों में सपने हैं और वर्षों की मेहनत के बाद उनके सामने यदि अनिश्चितता खड़ी हो जाए तो उनका आक्रोश स्वाभाविक है।
जिस युवा ने अपनी जिंदगी के सबसे अच्छे साल किसी परीक्षा की तैयारी में लगा दिए हों, उसे केवल आश्वासन नहीं चाहिए—उसे भरोसा चाहिए।
और भरोसा भाषणों से नहीं, पारदर्शी व्यवस्था से पैदा होता है।
झारखंड का घटनाक्रम यह भी बताता है कि आंदोलन का जवाब हमेशा टकराव नहीं होता। बातचीत भी रास्ता हो सकती है। 18 अगस्त को राहुल गांधी ने छात्रों और सरकार के बीच बनी सहमति का स्वागत करते हुए कहा कि यही सही तरीका है—छात्र सवाल करें तो उन्हें जवाब मिलना चाहिए।
यह लोकतंत्र की एक बेहद साधारण लेकिन आज के समय में असाधारण लगने वाली बात है।
छात्र सवाल करेंगे।
सरकार जवाब देगी।
जरूरत होगी तो सरकार अपनी गलती सुधारेगी।
और यदि व्यवस्था में कमी है तो उसे बदलने का साहस दिखाएगी।
बस, लोकतंत्र इतना ही तो मांगता है।
सत्ता पक्ष को झारखंड की इस घटना से असहज होने की जरूरत नहीं, सचेत होने की जरूरत है।
क्योंकि आज का छात्र केवल नौकरी नहीं मांग रहा; वह अपने भविष्य की विश्वसनीयता मांग रहा है। वह पूछ रहा है कि यदि मेहनत करूंगा तो क्या व्यवस्था मेरे साथ न्याय करेगी? यदि परीक्षा दूंगा तो क्या परिणाम निष्पक्ष होगा? यदि गलती होगी तो क्या सरकार मेरी आवाज सुनेगी?
इन सवालों का जवाब किसी पार्टी का नहीं, पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था का दायित्व है।
राहुल गांधी की तारीफ इसलिए नहीं होनी चाहिए कि वह राहुल गांधी हैं; तारीफ इसलिए होनी चाहिए कि उन्होंने कम-से-कम इस प्रसंग में राजनीतिक सुविधा से ऊपर युवा की आवाज को रखने का साहस दिखाया।
और सत्ता के लिए इससे बड़ा संदेश शायद कोई नहीं—
विपक्ष से सवाल पूछना आसान है,
अपने सहयोगी से सवाल पूछना कठिन है,
लेकिन अपनी ही सरकार से जनता के पक्ष में सवाल पूछ देना—यही लोकतंत्र की असली परीक्षा है।
आज सत्ता के गलियारों को यह समझना होगा कि युवा को डांटकर, डराकर या उसकी आवाज को राजनीतिक रंग देकर भविष्य की बेचैनी खत्म नहीं की जा सकती।
युवा को मंच चाहिए, संवाद चाहिए, न्याय चाहिए।
क्योंकि जिस दिन देश का युवा यह मान लेगा कि उसकी मेहनत का कोई मूल्य नहीं और उसकी आवाज का कोई अर्थ नहीं, उस दिन समस्या किसी एक सरकार की नहीं रहेगी—लोकतंत्र के भरोसे की होगी।
और लोकतंत्र में सबसे खतरनाक चीज सत्ता का विरोध नहीं होती।
सबसे खतरनाक चीज होती है—जनता का भरोसा टूट जाना।
