दरअसल, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देशों के बाद उज्जैन नगर निगम सीमा से शराब की दुकानों को बाहर किए जाने की कार्रवाई पहले ही हो चुकी है। इसके बाद विभिन्न सामाजिक और हिंदू संगठनों की ओर से शहर में संचालित मांस-मटन और मछली की दुकानों को भी नगर सीमा से बाहर स्थानांतरित करने की मांग लगातार उठाई जा रही है। इसी क्रम में उज्जैन के महापौर मुकेश टटवाल ने कुछ समय पहले घोषणा की थी कि इस विषय पर एमआईसी बैठक में प्रस्ताव लाया जाएगा।
शहर में यह माना जा रहा था कि प्रस्ताव पारित होने के बाद दुकानों को नगर निगम सीमा से बाहर स्थानांतरित करने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। हालांकि हाल ही में आयोजित एमआईसी बैठक में यह प्रस्ताव प्रस्तुत ही नहीं किया गया, जिसके बाद विवाद खड़ा हो गया। महापौर मुकेश टटवाल ने बताया कि प्रस्ताव नगर निगम आयुक्त अभिलाष मिश्रा को भेजा गया था, लेकिन बैठक के एजेंडे में इसे शामिल नहीं किया गया। इसके कारण इस विषय पर कोई निर्णय नहीं हो सका।
एमआईसी बैठक में प्रस्ताव नहीं आने के बाद हिंदू जागरण मंच समेत कई हिंदूवादी संगठनों ने नाराजगी व्यक्त की है। संगठन के पदाधिकारियों अर्जुन भदौरिया और रितेश माहेश्वरी ने आरोप लगाया कि इससे पहले भी शहर में मटन दुकानों को हटाने के दावे किए गए थे, लेकिन धरातल पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने कहा कि दो वर्ष पहले भी नगर निगम परिषद में इस मुद्दे को लेकर विरोध दर्ज कराया गया था और महाकाल मंदिर मार्ग से मांस की दुकानों को हटाने की बात कही गई थी, लेकिन स्थिति आज भी जस की तस बनी हुई है।
अर्जुन भदौरिया ने दावा किया कि उन्हें इस बार भी दुकानों के स्थानांतरण को लेकर भरोसा नहीं है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यदि महापौर अपने दावे के अनुरूप शहर से मांस-मटन की दुकानों को हटाने में सफल होते हैं तो हिंदूवादी संगठन उनका दूध से स्नान कर सम्मान करेंगे। यह बयान अब राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है।
जानकारी के अनुसार महाकाल मंदिर पहुंच मार्ग और उससे जुड़े कई प्रमुख क्षेत्रों में वर्तमान में मांस-मटन की दुकानें संचालित हो रही हैं। इनमें हरिफाटक, बेगमबाग, मालीपुरा, तोपखाना, सब्जी मंडी, छत्री चौक, पटनी बाजार, महाकाल मार्ग, तेलीवाड़ा और खारकुआं जैसे इलाके शामिल हैं। स्थानीय स्तर पर यह दावा किया जा रहा है कि पूरे शहर में 150 से अधिक मांस, मटन और मछली की दुकानें संचालित हो रही हैं।
फिलहाल इस विषय पर अंतिम निर्णय नहीं हो पाया है, लेकिन प्रस्ताव को लेकर शुरू हुआ विवाद यह संकेत दे रहा है कि आने वाले दिनों में उज्जैन की स्थानीय राजनीति में यह मुद्दा और अधिक प्रमुखता से उभर सकता है।
