नए नियमों के लागू होने के बाद सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी भी काफी बढ़ जाएगी। Meta, TikTok, YouTube और X जैसे प्लेटफॉर्म्स को यह सुनिश्चित करना होगा कि नाबालिग यूजर्स आसानी से अकाउंट न बना सकें। इसके साथ ही कंपनियों को कंटेंट मॉडरेशन सिस्टम को मजबूत करना होगा और शिकायतों पर तेजी से कार्रवाई करनी होगी।
सरकार के नियमों के अनुसार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को अब विज्ञापन देने वालों की पहचान की जांच भी करनी होगी। अगर किसी फोटो, वीडियो या कंटेंट में बदलाव या एआई जनरेटेड एडिटिंग की गई है, तो उसे स्पष्ट रूप से लेबल करना अनिवार्य होगा। हालांकि सरकार ने कंपनियों को इन नियमों को लागू करने के लिए कुछ समय देने की बात कही है, लेकिन इसकी सटीक समयसीमा अभी तय नहीं है।
इसी बीच मलेशिया सरकार एज वेरिफिकेशन सिस्टम लागू करने की तैयारी भी कर रही है, जिसके तहत यूजर्स की उम्र की पुष्टि जरूरी हो सकती है। यह सिस्टम पहचान पत्र या अन्य डिजिटल वेरिफिकेशन तरीकों पर आधारित हो सकता है। हालांकि विशेषज्ञों ने इस पर प्राइवेसी और डेटा सुरक्षा को लेकर चिंता भी जताई है।
पिछले कुछ वर्षों में मलेशिया में ऑनलाइन फ्रॉड, साइबर बुलिंग और बच्चों से जुड़े आपत्तिजनक कंटेंट के मामले तेजी से बढ़े हैं। सरकार विशेष रूप से ऑनलाइन जुआ, स्कैम, साइबर अपराध और भड़काऊ कंटेंट को लेकर चिंतित है। इसी वजह से बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को प्राथमिकता दी जा रही है।
मलेशिया अकेला देश नहीं है जो इस दिशा में कदम उठा रहा है। इससे पहले ऑस्ट्रेलिया ने भी 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर सख्त नियम लागू किए हैं। वहीं फ्रांस, यूके और अमेरिका के कई हिस्सों में भी इसी तरह की नीतियों पर काम चल रहा है।
इन नए नियमों का सीधा असर वैश्विक टेक कंपनियों पर पड़ेगा। अब उन्हें अपने प्लेटफॉर्म्स पर उम्र सत्यापन और कंटेंट मॉनिटरिंग सिस्टम को और मजबूत करना होगा। दक्षिण-पूर्व एशिया का बड़ा यूजर बेस होने के कारण यह बदलाव टेक कंपनियों के लिए रणनीतिक रूप से भी बेहद अहम माना जा रहा है।
कुल मिलाकर यह फैसला बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, लेकिन इसके क्रियान्वयन को लेकर कई तकनीकी और प्राइवेसी चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं।
