नोटिस में साफ कहा गया है कि 19 जनवरी का नोटिस उनकी प्रतिष्ठा, सम्मान, गरिमा और आर्थिक हितों को नुकसान पहुंचाने वाला है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के वकील ने कहा है कि यदि नोटिस 24 घंटे के अंदर वापस नहीं लिया गया, तो अवमानना न्यायालय अधिनियम 1971 और संविधान के अनुच्छेद 129 के तहत कार्रवाई की जाएगी। साथ ही शंकराचार्य परंपरा और स्वामी की छवि को ठेस पहुंचाने के आरोप में भी कानूनी कदम उठाए जाएंगे।
पुराने विवाद का ताजा जिक्र
नोटिस में पुराने विवाद का जिक्र भी किया गया है।
नोटिस में यह भी आरोप लगाया गया है कि गोवर्धन मठ, पुरी के शंकराचार्य की ओर से सुप्रीम कोर्ट में जाली और मनगढ़ंत आवेदन दाखिल किया गया, जिसमें गलत तरीके से कहा गया कि उन्होंने अविमुक्तेश्वरानंद की नियुक्ति को अस्वीकार कर दिया है।
मामले की सुनवाई 14 अक्टूबर 2022 को हुई थी, लेकिन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद धार्मिक अनुष्ठान में व्यस्त होने के कारण अदालत में अपना पक्ष नहीं रख पाए। सुप्रीम कोर्ट ने तथ्यों के आधार पर अंतरिम आदेश पारित किया, लेकिन नोटिस में दावा किया गया कि यह आदेश व्यावहारिक रूप से बेअसर था क्योंकि उनका अभिषेक पहले ही पूरा हो चुका था।
इसके बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने 9 मार्च 2024 को सुप्रीम कोर्ट में एक और आवेदन दाखिल किया, जिसमें उन्होंने स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती पर झूठी गवाही (परजरी) की कार्रवाई की मांग की। उनका दावा है कि अदालत को गलत तथ्यों के आधार पर गुमराह किया गया।
अब सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार 24 घंटे की समय-सीमा में क्या कदम उठाती है। अगर नोटिस वापस नहीं लिया गया, तो यह मामला फिर से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकता है और कानूनी लड़ाई और तेज होने की संभावना है।
