लंबित मामलों की गंभीर स्थिति
हालिया आंकड़ों के अनुसार, अगस्त 2025 तक न्यायाधीशों की संख्या औसतन 42–43 रही। इस अवधि में कुल 84,455 नए मामले दर्ज हुए, जबकि 90,045 मामलों का निपटारा हुआ, जिससे केवल 5,590 मामलों की शुद्ध कमी दर्ज हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि इस गति के बावजूद लंबित मामलों का समाधान 39–40 वर्षों में ही संभव होगा।
न्यायिक रिक्तियों का कारण
1989–90 की एरियर कमेटी की रिपोर्ट और हालिया विश्लेषण यह स्पष्ट करते हैं कि उच्च न्यायालयों में मामलों के जमा होने का मुख्य कारण न्यायाधीशों की नियुक्तियों में देरी है। वर्तमान स्थिति दर्शाती है कि न्याय प्रक्रिया अत्यधिक धीमी होने पर संविधान द्वारा प्रदत्त न्याय तक त्वरित पहुँच (अनुच्छेद 39-ए) का अधिकार केवल औपचारिक बनकर रह जाएगा।
न्यायाधीशों की आवश्यक संख्या और अनुशंसाएं
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपनी स्वीकृत क्षमता 53 से बढ़ाकर 85 न्यायाधीश करने की अनुशंसा की है। केंद्र और राज्य सरकार से अब तक वित्तीय एवं प्रशासनिक स्वीकृति लंबित है।
लक्ष्य यह है कि अगले पांच वर्षों में लंबित मामलों को खत्म करने के लिए प्रति माह 22,000–23,000 मामलों का निपटारा आवश्यक होगा। इसके लिए कम से कम 75 कार्यरत न्यायाधीश तुरंत नियुक्त किए जाने चाहिए।
वर्ष 2026 में मुख्य न्यायाधीश सहित सात न्यायाधीश सेवानिवृत्त होने वाले हैं। यदि नई नियुक्तियां समय पर नहीं होतीं, तो लंबित मामलों का बैकलाग फिर बढ़ सकता है।
सुधार की दिशा
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में सुधार तभी स्थायी होगा जब
न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाई जाए
विशेष बेंचों का गठन किया जाए
आधुनिक डिजिटाइजेशन और प्रबंधन प्रणाली लागू की जाए
साथ ही सरकार को अनुच्छेद 39-ए के तहत अपनी जवाबदेही निभाते हुए नियुक्ति प्रक्रिया में तेजी लानी होगी, ताकि आम जनता का न्यायपालिका पर भरोसा कायम रहे।
