
नर्मदापुरम 23,फरवरी,2026(हिन्द संतरी नीलेश यादव ) देश विकाश कर रहा है, लाखों करोड़ों के व्यवसाय स्थापित करने वालों की बात हो या करोड़ों -अरबों रूपये का व्यावसाय स्थापित कर रोजगार देने वालों की बात हो, उन्हें सब मिलता है सरकार से लोन, जमींन आदि फ्री में, पर एक किसान को एक भैस और पाडा का ऋण देकर उसके सफलता की कहानी 15 साल बाद उजागर कर सरकार और जिले के विकास को ढिढोरा पीटने का काम कर उस उपलब्धि को योजना से जोड़ा जाए तो यह वर्तमान सरकार और उसके निष्ठावान अधिकारी ही कर सकते है, सो उन्होंने किया , जिस योजना में एक व्यक्ति की बात छोडिये परिवार की जिम्मेदारी का निर्वहन न हो सके उसका बाजा पीटा जाना क्या उस संघर्षशील व्यक्ति का अपमान और योजना की विफलता नहीं जिसे आज महिमामंडित किया जा रहा है।
बात है विकासखंड बनखेड़ी के ग्राम रिछेड़ा निवासी बलराम सिंह गुर्जर की, जिसने राष्ट्रीय पशुधन मिशन एवं मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना (पशुपालन) के अंतर्गत वर्ष 2008-09 में लाभार्थी के रूप में पंजीकृत कराने के योजना से योजना से जुड़ने के 15 वर्षों बाद उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव आया है और आज वे आत्मनिर्भर पशुपालक के रूप में अपनी पहचान बना पाए हैं। श्री गुर्जर को सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से जिले के ग्रामीण अंचलों में आत्मनिर्भरता और आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति का प्रतीक माना रही जिला सरकार उसके 15 सालों के संघर्ष को विस्मृत कर आज उसका श्रेय लेकर उसे सफल बता रही है जबकि इतने वर्षों असफल रहने के बाद उसके जुझारूपन और हार न मानने तथा बुरे समय में किसी के साथ खड़ा न होने को सभी लोग भूल चुके है
वे इतने कमज़ोर आर्थिक पृष्टभूमि से पिछड़े थे की इराष्ट्रीय पशुधन मिशन एवं मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना के वर्ष 2008-09 मइ लाभार्थी होने से के बाद भी अन्य किसानों से दूध खरीदकर उसका विक्रय कर अपनी आजीविका चलाते थे, लगभग 15-16 वर्ष पूर्व विभागीय अधिकारियों एवं मित्रों के मार्गदर्शन में उन्होंने स्वयं पशुपालन व्यवसाय प्रारंभ करने का निर्णय लिया। तब उन्हें 01 भैंस एवं 01 मुर्रा पाड़ा से अपने व्यवसाय की शुरुआत की। भैंस के दूध तथा मुर्रा पाड़ा की सर्विस से उन्हें नियमित आय होने लगी, जिससे उन्होंने धीरे-धीरे अन्य पशुओं की खरीद की। व्यवसाय के दौरान परिवार पर कठिन समय भी आया। माता की गंभीर बीमारी के कारण उन्हें कुछ पशु बेचने पड़े, किंतु उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। परिवार की महिलाओं एवं अन्य सदस्यों ने भी पशुपालन कार्य में सक्रिय सहयोग दिया। वर्तमान में उनके पास 05 भैंस एवं 06 गाय हैं, जिनसे प्रतिदिन लगभग 70 लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है। इससे उन्हें प्रतिमाह लगभग 25 हजार से 30 हजार रुपये की आय प्राप्त हो रही है।
कृषि योग्य भूमि एवं घर में पर्याप्त स्थान न होने के कारण वे समय-समय पर पशुओं का विक्रय कर अतिरिक्त आय भी अर्जित करते हैं। आज उनका पूरा परिवार इसी व्यवसाय पर निर्भर है। योजना से जुड़ने के पूर्व उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर थी तथा आय का एकमात्र साधन अन्य किसानों से दूध खरीदकर बेचना था, लेकिन नियमित दुग्ध उत्पादन और स्वरोजगार के माध्यम से अब उनका जीवन स्तर बेहतर हुआ है और बच्चों की शिक्षा भी सुनिश्चित हो सकी है। वर्तमान में पशु चिकित्सकों एवं विभागीय अधिकारियों द्वारा उन्हें निरंतर तकनीकी मार्गदर्शन, टीकाकरण एवं पशु बीमा की सुविधा प्रदान की जा रही है। पशु बीमा का उन्हें शत-प्रतिशत लाभ प्राप्त हुआ है। स्वयं के मुर्रा पाड़ा की सर्विस से उत्पन्न बछड़ों ने भी उनके व्यवसाय को मजबूती दी है।
