कानून में बेहद सख्त प्रावधान किए गए थे। इसमें दोषियों के लिए 10 साल तक की जेल, एक करोड़ रुपये तक जुर्माना और संपत्ति कुर्क करने जैसे कदम शामिल किए गए थे। परीक्षा में गड़बड़ी करने वाले संगठित गिरोहों, सॉल्वर गैंग और एजेंसियों के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई का प्रावधान रखा गया था। उम्मीद थी कि इतने कड़े नियमों के बाद पेपर लीक जैसी घटनाओं में भारी कमी आएगी। लेकिन हाल ही में सामने आए नए विवादों ने इस उम्मीद पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कानून बना देने से समस्या खत्म नहीं होती, बल्कि उसका प्रभावी क्रियान्वयन सबसे ज्यादा जरूरी होता है। अब तक सामने आए कई मामलों में जांच एजेंसियों की कार्रवाई निचले स्तर के लोगों तक ही सीमित दिखाई दी है। छोटे कर्मचारी, परीक्षा केंद्र से जुड़े लोग या डमी उम्मीदवार गिरफ्त में आते हैं, लेकिन असली मास्टरमाइंड और बड़े नेटवर्क कानून की पकड़ से दूर नजर आते हैं। इससे अपराधियों में डर की बजाय व्यवस्था की कमजोरियों का भरोसा बढ़ता दिखाई देता है।
एक और बड़ी चिंता जांच और न्यायिक प्रक्रिया की धीमी रफ्तार को लेकर सामने आ रही है। कई मामलों में अदालतों तक मामला पहुंचने और अंतिम फैसला आने में लंबा समय लग जाता है। जब सजा में देरी होती है तो कानून का प्रभाव भी कमजोर पड़ने लगता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अपराधियों के मन में डर पैदा करने के लिए त्वरित कार्रवाई और समयबद्ध फैसले बेहद जरूरी हैं।
इसके अलावा कुछ कानूनी प्रावधानों पर भी सवाल उठ रहे हैं। व्यवस्था में ऐसे प्रावधान मौजूद हैं जिनके जरिए कई बार तकनीकी गड़बड़ी या प्रशासनिक त्रुटियों को आधार बनाकर बड़ी जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश की जाती है। ऐसे मामलों में जवाबदेही तय करना कठिन हो जाता है और जांच लंबी खिंचती चली जाती है।
लगातार सामने आ रही पेपर लीक घटनाओं ने युवाओं का भरोसा भी प्रभावित किया है। लाखों छात्र वर्षों की मेहनत के बाद परीक्षाओं में बैठते हैं और जब ऐसे विवाद सामने आते हैं तो केवल परीक्षा नहीं, बल्कि उनका आत्मविश्वास भी टूटता है। अब छात्र केवल सख्त कानून की घोषणा नहीं, बल्कि जमीन पर उसके असर को देखना चाहते हैं। क्योंकि जब तक बड़े नेटवर्क और असली दोषियों पर निर्णायक कार्रवाई नहीं होगी, तब तक पेपर लीक की यह समस्या खत्म होने की उम्मीद अधूरी ही रहेगी।
