लेकिन इस पूरे ऑपरेशन में जो बात सामने आई, उसने विशेषज्ञों को भी हैरान कर दिया। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, E-5 वास्तव में स्वभाव से हिंसक नहीं था, बल्कि अपने झुंड से अलग हो जाने के कारण लंबे समय से अकेलेपन और तनाव में था। माना जा रहा है कि इसी मानसिक स्थिति ने उसके व्यवहार को आक्रामक बना दिया था।
रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से प्रशिक्षित पालतू हाथी रामा को मैदान में उतारा गया। आमतौर पर जंगली हाथी अन्य हाथियों या इंसानों के संपर्क में आने पर आक्रामक हो जाते हैं, लेकिन E-5 ने रामा को देखते ही अलग व्यवहार दिखाया। वह शांत हुआ और धीरे-धीरे उसके करीब आने लगा। विशेषज्ञों ने इसे सामाजिक जुड़ाव की तलाश के रूप में देखा।
वन विभाग की टीम ने इससे पहले 22 मई को हाथी को काबू में करने की कोशिश की थी, लेकिन वह प्रयास असफल रहा था। उस दौरान E-5 ने पिंजरा और GPS कॉलर तक तोड़ दिया था। इसके बाद रणनीति बदली गई और रातों-रात एक नया प्लान तैयार किया गया।
मुख्य वन्यजीव वार्डन डॉ. समिता राजौरा के नेतृत्व में अगले चरण में पालतू हाथियों और माहूतों की मदद से उसे सफलतापूर्वक रेडियो कॉलर पहनाया गया। इसके बाद उसे सुरक्षित रूप से बांधवगढ़ रेंज में शिफ्ट किया गया।
अब E-5 को अन्य हाथियों के झुंड के करीब रखा गया है, ताकि वह दोबारा सामाजिक वातावरण में लौट सके और सामान्य जीवन जी सके। यह पूरा मामला वन्यजीव व्यवहार और उनके मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक नई समझ भी सामने लाता है।
