चेदीदास (संजीव डे राय )
शायद अंग्रेजों ने भी भारतीय आन्दोलन कुचलने के लिए इतनी बर्बरता नही दिखाई होगी फिर तो देश में भाजपा का शासन अपनों अपनों का ही है..?
लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान यह नहीं कि चुनाव समय पर हो जाएँ, बल्कि यह है कि जनता अपनी बात बिना भय के कह सके और सत्ता उसे सुनने का धैर्य रखे। जब किसी प्रदर्शन को नियंत्रित करने के नाम पर बल प्रयोग के दृश्य सामने आते हैं और उसके बाद जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की खामोशी लंबी होती चली जाती है, तब कई सवाल स्वाभाविक रूप से उठते हैं।
कहा जाता है कि “अपने भले के लिए गुलामी भी एक सीमा तक ही ठीक होती है।” यदि समाज अन्याय या कठोरता को केवल इसलिए स्वीकार करने लगे कि कहीं उसका अपना नुकसान न हो जाए, तो धीरे-धीरे उसकी संवेदनाएँ भी कैद हो जाती हैं। तब अन्याय केवल पीड़ित पर नहीं होता, बल्कि पूरे समाज के आत्मसम्मान पर होता है।
दिल्ली की हालिया घटनाओं ने यही प्रश्न फिर सामने खड़ा किया है कि क्या असहमति को केवल कानून-व्यवस्था का विषय मान लेना पर्याप्त है, या उसे लोकतांत्रिक संवाद के अवसर के रूप में भी देखा जाना चाहिए? किसी भी पक्ष की राजनीतिक विचारधारा अलग हो सकती है, लेकिन नागरिकों के साथ व्यवहार में संयम, गरिमा और जवाबदेही लोकतंत्र की मूल अपेक्षाएँ हैं।
सबसे अधिक चिंता उस खामोशी की होती है जो घटनाओं के बाद दिखाई देती है। लोकतंत्र में सत्ता का मौन कई बार शब्दों से अधिक अर्थ रखता है। यदि कहीं बल प्रयोग हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष समीक्षा और जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक है। और यदि कार्रवाई परिस्थितियों के अनुरूप थी, तो उसका स्पष्ट और पारदर्शी स्पष्टीकरण भी जनता का अधिकार है।
आज ऐसा वातावरण बनता दिखाई देता है कि कुछ लोग यह महसूस करने लगते हैं मानो उनके अधिकारों का महत्व दूसरों से कम है। जबकि संविधान किसी नागरिक को प्रथम या द्वितीय श्रेणी का दर्जा नहीं देता। कानून की नजर में हर व्यक्ति समान है और हर नागरिक की गरिमा समान रूप से संरक्षित होनी चाहिए।
इतिहास गवाह है कि सत्ता की सबसे बड़ी ताकत लाठी नहीं, बल्कि जनता का विश्वास होता है। भय से व्यवस्था कुछ समय तक चल सकती है, लेकिन विश्वास से राष्ट्र आगे बढ़ता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि असहमति को देशद्रोह नहीं, लोकतंत्र की स्वाभाविक धड़कन समझा जाए; विरोध को शत्रुता नहीं, संवाद का अवसर माना जाए; और नागरिक अधिकारों की रक्षा किसी दल के नहीं, पूरे लोकतंत्र के हित में की जाए।
लोकतंत्र में “शेम-शेम” का नारा किसी एक सरकार या दल के लिए नहीं होना चाहिए। असली शर्म तब है जब नागरिक अपने अधिकारों के प्रयोग से डरने लगें, जब सवाल पूछना अपराध जैसा महसूस होने लगे, और जब सत्ता से जवाब मांगने वालों को ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाए।
एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान यही है कि वह आलोचना से घबराता नहीं, बल्कि उससे स्वयं को और अधिक उत्तरदायी बनाता है।
