लोकतंत्र का सबसे सरल अर्थ है—जनता का शासन, जनता के लिए शासन और जनता की भागीदारी वाला शासन। यदि इस व्यवस्था में वही जनता अपने छोटे-छोटे कामों के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाती रहे, घंटों कतार में खड़ी रहे, एक मेज से दूसरी मेज तक भेजी जाती रहे और अपने अधिकार की सुविधा पाने के लिए किसी अधिकारी या कर्मचारी की कृपा की प्रतीक्षा करे, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि हमारा जनतंत्र आखिर किसके लिए है? लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि और सरकारी कर्मचारी जनता के सेवक माने जाते हैं, लेकिन व्यवहार में अनेक बार तस्वीर उलटी दिखाई देती है। समस्या केवल समय की नहीं है। यह नागरिक की गरिमा, अधिकार और लोकतंत्र पर उसके विश्वास से जुड़ा प्रश्न है।
एक लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता का सबसे बड़ा पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि कितने कार्यालय बने, कितनी योजनाएं घोषित हुईं या कितनी बैठकों का आयोजन हुआ। असली सवाल यह होना चाहिए कि सामान्य नागरिक का जीवन कितना आसान हुआ। यदि किसी व्यक्ति को अपने वैध अधिकार के लिए बार-बार आवेदन करना पड़े, वही कागज अलग-अलग जगह जमा करने पड़ें, दस्तावेजों की प्रतियां बार-बार देनी पड़ें और हर चरण पर यह पता लगाना पड़े कि अगला दरवाजा कौन-सा है, तो व्यवस्था में कहीं न कहीं गंभीर कमी है। सरकार का उद्देश्य नागरिक को प्रक्रिया में उलझाना नहीं, उसकी समस्या का समाधान करना चाहिए। शासन की हर प्रक्रिया का अंतिम केंद्र नागरिक होना चाहिए। कार्यालय, नियम, अधिकारी, तकनीक और योजनाएं साधन हैं; जनता लक्ष्य है। जब साधन ही लक्ष्य पर भारी पड़ने लगें, तब लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होती है।
विडंबना यह है कि नागरिकों को अनेक बार ऐसी भाषा और ऐसी प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ता है जिन्हें समझना उनके लिए आसान नहीं होता। एक सामान्य व्यक्ति यह जानना चाहता है कि उसका काम कैसे होगा, कौन-से दस्तावेज चाहिए, कितना समय लगेगा और यदि काम न हो तो शिकायत कहां करनी है। लेकिन उसे कई बार इसके बजाय नियमों, कागजों और जिम्मेदारियों की ऐसी भूलभुलैया मिलती है जिसमें वह स्वयं को असहाय महसूस करता है। जिस राज्य ने नागरिक के लिए व्यवस्था बनाई है, उसी व्यवस्था को समझने और उसमें रास्ता खोजने का बोझ भी नागरिक पर डाल दिया जाता है। यह स्थिति बदलनी चाहिए। प्रशासन की भाषा सरल होनी चाहिए, प्रक्रियाएं स्पष्ट होनी चाहिए और जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। नागरिक को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि वह किसी पर उपकार मांगने गया है। वह अपनी वैध सेवा और अधिकार लेने गया है।
जनतंत्र को सचमुच जनता-केंद्रित बनाने का अर्थ यह भी है कि सरकार नागरिक के पास पहुंचे। आज तकनीक ने ऐसी संभावनाएं पैदा की हैं जिनसे बहुत-से काम घर से या निकटतम सुविधा केंद्र से किए जा सकते हैं। लेकिन केवल ऑनलाइन पोर्टल बना देना पर्याप्त नहीं है। यदि वेबसाइट कठिन हो, आवेदन बार-बार असफल हो, दस्तावेज अपलोड करने में परेशानी हो, स्थिति की जानकारी स्पष्ट न मिले या डिजिटल सुविधा से वंचित व्यक्ति के लिए कोई सरल वैकल्पिक व्यवस्था न हो, तो तकनीक भी एक नया चक्कर बन सकती है। डिजिटल शासन का उद्देश्य कार्यालय की कतार को मोबाइल या कंप्यूटर की कतार में बदलना नहीं होना चाहिए। तकनीक तभी सफल है जब वह नागरिक का समय बचाए, प्रक्रिया सरल करे और निर्णय की पारदर्शिता बढ़ाए।
जनता को दफ्तरों के चक्कर लगाने की समस्या का एक बड़ा कारण जिम्मेदारी के स्पष्ट निर्धारण का अभाव भी हो सकता है। नागरिक को अक्सर यह पता नहीं होता कि उसके आवेदन पर निर्णय लेने की जिम्मेदारी किसकी है और कितने समय में निर्णय होना चाहिए। ऐसी व्यवस्था में आवेदन आगे बढ़ता रहता है, लेकिन नागरिक की चिंता भी साथ-साथ बढ़ती रहती है। यदि हर सेवा के लिए स्पष्ट समय सीमा, जिम्मेदार अधिकारी, आवेदन की स्थिति और शिकायत का सरल रास्ता उपलब्ध हो, तो नागरिक की निर्भरता घट सकती है। किसी कर्मचारी या अधिकारी के व्यक्तिगत व्यवहार पर नागरिक का काम निर्भर नहीं होना चाहिए। नियम व्यक्ति से बड़े होने चाहिए और व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें सही काम के लिए किसी विशेष व्यक्ति तक पहुंच बनाना जरूरी न हो।
यहां जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। विधायक, सांसद, पार्षद और अन्य निर्वाचित प्रतिनिधि जनता की समस्याओं को सुनने और उन्हें उचित मंच तक पहुंचाने के लिए चुने जाते हैं। लेकिन जनप्रतिनिधि का काम हर नागरिक के छोटे-छोटे प्रशासनिक कार्यों को व्यक्तिगत रूप से करवाना नहीं होना चाहिए। यदि नागरिक को हर प्रमाणपत्र या सामान्य सरकारी सेवा के लिए किसी जनप्रतिनिधि की सिफारिश की जरूरत पड़ती है, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था की कमजोरी का संकेत है। जनप्रतिनिधियों को ऐसी व्यवस्था बनाने पर जोर देना चाहिए जिसमें नागरिक बिना सिफारिश, पहचान या व्यक्तिगत संपर्क के अपने अधिकार प्राप्त कर सके। लोकतंत्र का उद्देश्य यह नहीं कि नागरिक किसी प्रभावशाली व्यक्ति तक पहुंच बनाए, बल्कि यह है कि नागरिक की पहुंच स्वयं व्यवस्था तक हो।
इसी तरह सरकारी कर्मचारियों के प्रति जनता का दृष्टिकोण भी सम्मानपूर्ण होना चाहिए और कर्मचारियों को भी नागरिक के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। हर सरकारी कर्मचारी भ्रष्ट या असंवेदनशील है, ऐसा कहना अनुचित होगा। बड़ी संख्या में कर्मचारी कठिन परिस्थितियों में अपनी जिम्मेदारियां निभाते हैं। लेकिन जहां नागरिकों के साथ अनावश्यक देरी, अस्पष्ट जवाब, असम्मानजनक व्यवहार या बार-बार बुलाने जैसी समस्याएं होती हैं, वहां सुधार आवश्यक है। सरकारी कार्यालय सेवा के केंद्र हैं, सत्ता प्रदर्शन के स्थान नहीं। कार्यालय में आने वाला नागरिक समस्या लेकर आता है; उसे समस्या से बड़ी समस्या देकर लौटाना प्रशासन की सफलता नहीं हो सकती। एक मुस्कान, स्पष्ट जानकारी और सही मार्गदर्शन भी सार्वजनिक सेवा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जनतंत्र में नागरिक मतदाता है। वह राज्य का केंद्र है। चुनाव के समय उसके पास वोट की शक्ति होती है, लेकिन उसकी नागरिकता की कीमत केवल वोट तक सीमित नहीं हो सकती। उसे सम्मान, पारदर्शिता, समयबद्ध सेवा और न्यायपूर्ण व्यवहार का अधिकार है। चुनाव के बाद भी सरकार और जनता का संबंध समाप्त नहीं होता। सरकार बदलती रहती है, अधिकारी बदलते रहते हैं, योजनाओं के नाम बदलते रहते हैं, लेकिन नागरिक बना रहता है। इसलिए शासन की निरंतरता का आधार नागरिक की सुविधा और अधिकार होने चाहिए। यदि सरकार जनता से मतदान के समय संपर्क करे और उसके बाद जनता को अपने काम के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़े, तो लोकतंत्र का यह संबंध अधूरा है।
हमें ऐसी प्रशासनिक संस्कृति विकसित करने की जरूरत है जिसमें सरकार यह पूछे कि नागरिक को मेरे कार्यालय तक क्यों आना पड़ रहा है। क्या यह काम स्वतः नहीं हो सकता? क्या उपलब्ध सरकारी अभिलेखों से जानकारी प्राप्त नहीं की जा सकती? क्या एक ही दस्तावेज बार-बार मांगने की जरूरत है? क्या आवेदन की स्थिति नागरिक को स्वयं नहीं बताई जा सकती? क्या किसी सेवा की समय सीमा तय नहीं की जा सकती? ऐसे सवाल व्यवस्था को नागरिक-केंद्रित बनाने की दिशा में ले जा सकते हैं। सिद्धांत सरल है—जहां सरकार के पास जानकारी है, वहां नागरिक से वही जानकारी बार-बार न मांगी जाए; जहां प्रक्रिया सरल हो सकती है, वहां उसे जटिल न बनाया जाए; और जहां निर्णय समय पर हो सकता है, वहां नागरिक को प्रतीक्षा में न रखा जाए।
अंततः हमें लोकतंत्र की सफलता को सत्ता के गलियारों से निकालकर नागरिक के घर और रोजमर्रा के जीवन में देखना होगा। लोकतंत्र तब मजबूत होगा जब वृद्ध व्यक्ति को पेंशन के लिए अनावश्यक चक्कर न लगाने पड़ें, विद्यार्थी को प्रमाणपत्र के लिए भटकना न पड़े, किसान को अपने वैध काम के लिए कई कार्यालयों में न जाना पड़े, मरीज को सहायता के लिए पहचान या सिफारिश न खोजनी पड़े और नागरिक को किसी कर्मचारी की कृपा पर निर्भर न रहना पड़े। जनसेवक सचमुच जनसेवक तभी कहलाएगा जब उसकी सेवा नागरिक तक पहुंचे, न कि नागरिक उसकी तलाश में भटके। इसलिए समय आ गया है कि हम पूछें—जनसेवकों के चक्कर लगाती जनता, यह कैसा जनतंत्र? इसका उत्तर व्यवस्था को अपने काम से देना होगा। सच्चा जनतंत्र वही है जिसमें जनता को सरकार तक पहुंचने के लिए रास्ते न खोजने पड़ें, बल्कि सरकार स्वयं जनता तक पहुंचने के रास्ते बनाती रहे।
डॉ. शैलेश शुक्ला | Dr. Shailesh Shukla
गृह मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा ‘राजभाषा गौरव पुरस्कार’ से सम्मानित
वैश्विक समूह संपादक, सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह
सलाहकार संपादक, गौड़सन्स टाइम्स
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