सियासत का भी बड़ा अजब मिज़ाज है। चुनाव आते ही युवा देश का भविष्य कहलाने लगता है, और चुनाव बीतते ही वही युवा फाइलों का एक नंबर बनकर रह जाता है। उसकी डिग्री अलमारी में टंगी रहती है, प्रतियोगी परीक्षाएँ तारीख़ों में उलझी रहती हैं और नौकरी विज्ञापनों की सुर्खियों में। लेकिन इतिहास गवाह है कि जब युवा अपने भविष्य की लड़ाई खुद लड़ने का फैसला कर लेता है, तब सत्ता के सबसे ऊँचे किले भी हिलने लगते हैं।
दुष्यंत कुमार ने बरसों पहले लिखा था—”कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं होता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।” लगता है, आज की पीढ़ी ने उस पंक्ति को केवल पढ़ा नहीं, बल्कि जीकर दिखा दिया। पत्थर हाथ में नहीं, सवालों के रूप में उछले हैं। चोट किसी व्यक्ति पर नहीं, व्यवस्था की खामियों पर है।
राजनीति का सबसे बड़ा भ्रम यही होता है कि जनता सब भूल जाती है। लेकिन जनता भूलती नहीं, केवल सही समय का इंतज़ार करती है। जिस दिन उसकी सहनशीलता जवाब देती है, उसी दिन लोकतंत्र अपना असली चेहरा दिखाता है। कुर्सियाँ तब भी रहती हैं, लेकिन उनके नीचे की ज़मीन खिसकने लगती है।
सत्ता का अहंकार भी बड़ा दिलचस्प होता है। उसे लगता है कि नाराज़गी सोशल मीडिया तक सीमित है। मगर जब वही नाराज़गी सड़कों पर उतर आती है, तब भाषणों से ज़्यादा संवाद की ज़रूरत पड़ती है। लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं, बल्कि नागरिक का अधिकार है। सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन यह अधिकार स्थायी रहता है।
आज का छात्र किसी दल का कार्यकर्ता बनकर नहीं, अपने भविष्य का प्रतिनिधि बनकर खड़ा दिखाई देता है। उसे नारे नहीं, निष्पक्ष परीक्षा चाहिए। उसे भाषण नहीं, भरोसा चाहिए। उसे आश्वासन नहीं, अवसर चाहिए। यही कारण है कि शिक्षा का प्रश्न अब केवल शिक्षा का प्रश्न नहीं रहा, बल्कि देश के भविष्य का प्रश्न बन चुका है।
सियासत को यह भी समझना होगा कि युवा केवल वोटर नहीं होता, वही कल का शिक्षक, वैज्ञानिक, सैनिक, डॉक्टर, पत्रकार, न्यायाधीश और प्रशासक भी होता है। यदि उसका विश्वास टूटता है, तो नुकसान केवल एक सरकार का नहीं, पूरे राष्ट्र का होता है।
शहरनामा की सलाह मुफ़्त है, लेकिन कीमती है— लोकतंत्र में संसद की दीवारें ऊँची करने से ज़्यादा ज़रूरी है जनता के विश्वास की नींव मज़बूत करना। क्योंकि इतिहास बताता है कि महलों की दीवारें बाहर से नहीं, भीतर की दरारों से गिरती हैं।
और अंत में…
युवाओं की आवाज़ को शोर समझने की भूल मत कीजिए। कई बार इतिहास की सबसे बड़ी क्रांतियाँ नारे लगाकर नहीं, सवाल पूछकर शुरू हुई हैं। लोकतंत्र में सत्ता की असली ताक़त विपक्ष को हराने में नहीं, बल्कि अपने युवाओं का विश्वास जीतने में होती है। जिस दिन यह बात हर शासक समझ लेगा, उस दिन न सड़कों पर इतना आक्रोश होगा और न लोकतंत्र को अपनी ताक़त साबित करने की ज़रूरत पड़ेगी।
शुभ रात्रि
दासानुदास चेदीराज दास
