नर्मदापुरम में नरक की कोई पट्टिका नहीं लगी है।
यहाँ न धुआँ दिखता है,
न आग की लपटें।
फिर भी लोग रोज़ समय पर
नरक पहुँच जाते हैं—
बस उसे “ड्यूटी”, “ऑफिस”, “सेटलमेंट” कहते हैं।
सुबह सेठानी घाट पर नर्मदा शांति से बहती है,
और थोड़ी दूर
आईटीआई रोड पर
चेहरे उबल रहे होते हैं।
नर्मदा ठंडी है,
मन गरम।
यहीं से शहर का नरक शुरू होता है।
पहला नरक : समय से बँधा मनुष्य
नर्मदापुरम का सबसे बड़ा नरक
कोई जगह नहीं,
एक घड़ी है।
बस छूट गई—तो नरक।
हाज़िरी लेट—तो नरक।
फाइल अटक गई—तो नरक।
लोग कहते हैं—
“समय नहीं है।”
पर सच यह है—
समय के गुलाम हो गए हैं।
कुंभीपाक में जीव
उबलते तेल में गिरता था,
यहाँ जीव
डेडलाइन में गिरता है।
दूसरा नरक : काम जो पूजा नहीं रहा
फैक्ट्री, दफ्तर, दुकान—
काम वही है,
पर भाव बदल गया है।
काम अब
सेवा नहीं,
सज़ा लगने लगा है।
लोग कहते हैं—
“बस निकल जाए यह नौकरी।”
राजा कुलशेखर याद आते हैं—
जो भगवान की शरण में नहीं,
उसके लिए
स्वर्ग भी बोझ है।
और नर्मदापुरम में
कितने ही लोग हैं
जो आरामदेह कुर्सी पर बैठे-बैठे
थक चुके हैं।
तीसरा नरक : आहार-निद्रा का बिगड़ा संतुलन
यह शहर छोटा है,
पर बीमारियाँ बड़ी हैं।
खाना समय पर नहीं,
नींद पूरी नहीं,
डर हर समय।
डायबिटीज़, बीपी, एंग्जायटी—
तीनों मिलकर
नर्मदापुरम का
स्थायी नागरिक बन चुके हैं।
आहार, निद्रा, भय, मैथुन—
चारों के लिए
लोग दिन-रात
खुद को
फैक्ट्री के हवाले कर चुके हैं।
यह नरक नहीं तो क्या है?
चौथा नरक : तुलना
नर्मदापुरम में लोग
दूसरों की तरक्की से नहीं,
अपनी तुलना से जलते हैं।
उसका बेटा बाहर है,
उसकी पोस्ट बड़ी है,
उसका घर नया है।
इस आग में
कोई शैतान नहीं डालता,
इंसान खुद जलता है।
यही वह नरक है
जहाँ कोई जेलर नहीं,
फिर भी आज़ादी नहीं।
सबसे गहरा नरक : भगवान की अनुपस्थिति
राजा कुलशेखर ने
सबसे बड़ा रहस्य
चुपचाप कह दिया था—
जहाँ भगवान नहीं,
वहाँ स्वर्ग भी नरक है।
नर्मदापुरम का असली नरक
न फैक्ट्री है,
न दफ्तर।
वह है—
ऐसा जीवन
जिसमें नर्मदा है,
पर नाम नहीं।
शहरनामा का आख़िरी सच
जो नर्मदा किनारे बैठकर भी
बेचैन है,
वह नरक में है।
और जो
आईटीआई रोड की धूल में भी
शांत है,
वह वैकुंठ के दरवाज़े पर।
नर्मदापुरम का नरक
कहीं और नहीं—
हमारी दृष्टि में है।
नाम आ जाए,
तो नरक ढीला पड़ जाता है।
नाम न हो,
तो स्वर्ग भी
फाइल बन जाता है।
दासानुदास चेदीराज दास
