भक्ति और बैंक बैलेंस…. शहर में दो चीज़ें सबसे ज़्यादा पूछी जाती हैं
पहली: “बैलेंस कितना है?”
दूसरी: “कहाँ काम करते हो?”
भक्ति का सवाल कोई तब पूछता है जब बिजली चली जाती है या रिपोर्ट अचानक पॉज़िटिव आ जाती है।
एटीएम की कतार और मंदिर की भीड़
शहरनामा ने देखा—
एटीएम के सामने लाइन में खड़ा आदमी धैर्यवान है,
मंदिर में वही आदमी जल्दी में है।
एटीएम में पैसा न निकले तो मशीन को नहीं कोसता,
भगवान से मनचाहा न मिले तो कहता है—
“अब कहाँ कुछ रखा है…”
गीता चुपचाप मुस्कराती है—
न मे भक्तः प्रणश्यति (गीता 9.31)
मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
पर शहर पूछता है—
“FD ( फ्किस डिपाजिट ) का क्या होगा?”
बैंक बैलेंस: ज़रूरी है, पर्याप्त नहीं
गीता कभी यह नहीं कहती कि
बैंक बैलेंस छोड़ दो।
वह बस यह याद दिलाती है—
यावत् जीवेत् सुखं जीवेत् — यह गीता नहीं, शहर का श्लोक है।
गीता का श्लोक कुछ और कहता है—
सन्तोषः परमं सुखम् (गीता 2.70 का भाव)
संतोष ही असली सुख है।
शहरनामा पूछता है—
जिसके खाते में दस लाख हैं,
वह बीस की चिंता में क्यों सो नहीं पाता?
नौकरी, प्रमोशन और पूजा की थाली
शहर का आदमी सुबह पूजा करता है—
लेकिन मन ऑफिस में लगा रहता है।
ऑफिस में काम करता है—
लेकिन मन प्रमोशन में उलझा रहता है।
गीता बीच में आकर कहती है—
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। (गीता 2.47)
काम करो, फल को भगवान के खाते में डाल दो।
पर शहरनामा जानता है—
हम भगवान को भी कहते हैं—
“मेरे अकाउंट में तुरंत ट्रांसफर कर दो।”
भक्ति का रिटर्न कब मिलता है?
यह शहर का सबसे बड़ा प्रश्न है।
भक्ति करने वाला पूछता है—
“इतना जप किया, क्या मिला?”
गीता सीधा जवाब देती है—
पत्रं पुष्पं फलं तोयं… (गीता 9.26)
भगवान वस्तु नहीं देखते,
वृत्ति देखते हैं।
शहरनामा जोड़ता है—
बैंक बैलेंस दिखता है,
भक्ति का बैलेंस चरित्र में दिखता है।
बच्चों की शिक्षा: पैकेज बनाम पात्रता
शहर के माता-पिता कहते हैं—
“बच्चा सेटल हो जाए बस।”
सेटल मतलब—
पैकेज, फ्लैट और गाड़ी।
गीता पूछती है—
विद्या विनय सम्पन्ने… (गीता 5.18)
विद्या वही है
जो विनय पैदा करे।
शहरनामा देखता है—
डिग्री बढ़ी,
विनय घट गया।
जब बैंक बैलेंस काम नहीं आता
अस्पताल की ICU में
ATM कार्ड नहीं चलता।
श्मशान में
लॉकर की चाबी नहीं खुलती।
तब भक्ति याद आती है—
थोड़ी देर से, पर सच्ची।
गीता पहले ही चेतावनी दे चुकी है—
अन्तकाले च मामेव स्मरन्… (गीता 8.5)
अंत समय में वही याद आता है
जिसे जीवन भर जिया हो।
शहरनामा का निष्कर्ष
बैंक बैलेंस
जीवन की सुविधा है,
जीवन का अर्थ नहीं।
भक्ति
जीवन का अर्थ है, सुविधा नहीं।
जिसके पास दोनों हों—
वह भाग्यशाली है।
जिसके पास भक्ति है—
वह कभी दिवालिया नहीं होता।
और जिसके पास सिर्फ़ बैंक बैलेंस है—
उसे डर हमेशा रहता है
कि कहीं ब्याज से पहले साँस न टूट जाए।
अगले शहरनामा में—
“मोबाइल में भगवान और भगवान में मोबाइल”
शुभ प्रभात दासानुदास चेदीराज दास