शहरनामा मोबाइल में भगवान और भगवान में मोबाइल
शहर में आज भगवान दो जगह सबसे ज़्यादा मिलते हैं
पहला मंदिर में,
दूसरा मोबाइल में।
मंदिर में भगवान को देखकर लोग झुकते हैं,
मोबाइल में भगवान को देखकर उँगली चलाते हैं।
सुबह की आरती और नोटिफ़िकेशन
सुबह पाँच बजे मंदिर की घंटी बजती है,
और साढ़े पाँच बजे मोबाइल की।
आरती में मन भटकता है—
“ऑफिस की मेल आई होगी…”
मेल पढ़ते समय अचानक याद आता है—
“आज एक श्लोक पढ़ लेना चाहिए।”
गीता बीच में टोका देती है—
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः (गीता 2.58)
जिसने इंद्रियों को समेटना सीख लिया,
वही स्थिर बुद्धि वाला है।
पर शहरनामा देखता है—
हम इंद्रियाँ नहीं समेटते,
चार्जर ढूँढते हैं।
ऑनलाइन दर्शन, ऑफ़लाइन आचरण
अब भगवान भी डिजिटल हो गए हैं—
लाइव दर्शन,
व्हाट्सऐप प्रवचन,
रील्स में कृष्ण।
लेकिन घर में—
माँ की आवाज़ सुनी नहीं जाती
बच्चे की बात टाली जाती है
गीता याद दिलाती है—
श्रद्धावान् लभते ज्ञानम् (गीता 4.39)
श्रद्धा हेडफ़ोन में नहीं,
हृदय में लगती है।
जप माला और स्क्रॉल माला
एक हाथ में जप माला,
दूसरे में मोबाइल।
माला के 108 मनके,
स्क्रॉल के अनगिनत।
गीता मुस्करा कर कहती है—
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति (गीता15.7)
मन और इंद्रियाँ
जीव को खींचती रहती हैं।
शहरनामा पूछता है—
हम खिंच रहे हैं
या खुद खिंचने में आनंद ले रहे हैं?
बच्चों की शिक्षा और स्क्रीन संस्कार
माता-पिता कहते हैं—
“बच्चा मोबाइल में बिज़ी है,
कम से कम बाहर नहीं भटक रहा।”
पर गीता पूछती है—
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं (गीता 6.5)
अपने को स्वयं ऊपर उठाओ।
स्क्रीन संस्कार नहीं देती,
संगति देती है—
और संगति अक्सर चुपके से चरित्र बदल देती है।
जब भगवान भी साइलेंट मोड पर चले जाएँ
शहर में भगवान को भी
साइलेंट मोड पर रखा गया है।
ज़रूरत पड़ी तो अनम्यूट,
वरना नोटिफ़िकेशन ऑफ़।
गीता चेतावनी देती है—
अन्तकाले च मामेव स्मरन् (गीता 8.5)
अंत समय में वही याद आता है
जो जीवन में आदत बन चुका हो।
शहरनामा डरता है—
कहीं अंत समय में
नेटवर्क न चला जाए।
शहरनामा का निष्कर्ष
मोबाइल बुरा नहीं है,
पर जब मोबाइल
भगवान से बड़ा हो जाए—
तो समझिए नेटवर्क डाउन है।
भगवान मोबाइल में हों,
यह ठीक है।
पर ज़रूरी यह है कि
हम भगवान में हों।
शुभ प्रभात
दासानुदास चेदीराज दास