यह प्रसंग बहुत गहरी बात कहता है। इसे केवल भविष्यवाणी की तरह पढ़ना इसके आध्यात्मिक अर्थ को छोटा कर देना होगा। संजय द्वारा युगों की अवधि का वर्णन करते हुए कलियुग में जीवन की अनिश्चितता का संकेत वास्तव में मनुष्य को यह समझाने वाला है कि जब धर्म, संयम, सदाचार और प्रकृति के प्रति सम्मान घटता है, तब जीवन की सुरक्षा भी अनिश्चित होने लगती है।
कलियुग और अनिश्चित जीवन — एक आध्यात्मिक संकेत
महाभारत के भीष्म पर्व में संजय जब युगों के स्वरूप और उनकी अवधि का वर्णन करते हैं, तो कलियुग के संदर्भ में एक अत्यंत मार्मिक संकेत मिलता है। कलियुग में मनुष्य का जीवन कितना होगा, इसे निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकेगा; क्योंकि अनेक जीव जन्म लेने से पहले ही अथवा जन्म लेते ही संसार से विदा हो जाएंगे।
इस बात को केवल मृत्यु की भविष्यवाणी मान लेना उचित नहीं। इसके भीतर एक बड़ा आध्यात्मिक संदेश छिपा है।
सत्ययुग में मनुष्य का जीवन केवल लंबा नहीं था, जीवन का उद्देश्य भी स्पष्ट था। धर्म जीवन की नींव था, संयम उसका आभूषण था और प्रकृति के साथ मनुष्य का संबंध शोषण का नहीं, सह-अस्तित्व का था। जैसे-जैसे युग बदलते गए, धर्म के चार चरणों में कमी आती गई और मनुष्य का बाहरी विकास बढ़ते हुए भी भीतर से कमजोर होता गया।
कलियुग की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि मनुष्य के पास जीने के साधन बढ़ते जाते हैं, लेकिन जीवन की निश्चितता घटती जाती है।
विज्ञान ने मनुष्य को बहुत कुछ दिया है—औषधियां दीं, अस्पताल दिए, तकनीक दी, संचार दिया। फिर भी जन्म से पहले मृत्यु का दुःख, नवजात शिशु की मृत्यु का दुःख और असमय मृत्यु का प्रश्न आज भी मनुष्य को भीतर तक हिला देता है।
इसलिए महाभारत का यह संकेत हमें डराने के लिए नहीं, जगाने के लिए है।
मनुष्य यह न समझे कि धन, विज्ञान, सत्ता और भौतिक सुविधाओं के बल पर वह जीवन को अपने नियंत्रण में ले आया है। जीवन आज भी उतना ही रहस्यमय है जितना हजारों वर्ष पहले था।
हम किसी बच्चे को संसार में लाते हैं और सोचते हैं कि उसके लिए पूरी दुनिया जीत लेंगे। लेकिन जीवन का पहला श्वास भी हमारे अधिकार में नहीं है। यही मनुष्य के अहंकार की सबसे बड़ी सीमा है।
और शायद इसी कारण भारतीय दर्शन बार-बार कहता है—
जीवन लंबा होना महत्वपूर्ण नहीं है, जीवन सार्थक होना महत्वपूर्ण है।
यदि किसी को सौ वर्ष मिलें और उसने केवल अपने लिए जिया, तो वह जीवन कितना बड़ा है? और यदि किसी को कम समय मिला लेकिन उसने प्रेम दिया, सेवा की, किसी के आँसू पोंछे, सत्य का साथ दिया और ईश्वर को याद करते हुए जीवन बिताया, तो उसके जीवन को छोटा कैसे कहा जा सकता है?
कलियुग के संदर्भ में यह बात और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। क्योंकि जब जीवन की अवधि निश्चित नहीं है, तब सत्कर्म को कल पर टालना सबसे बड़ी भूल है।
हम कहते हैं—
“अभी उम्र ही क्या हुई है, बाद में धर्म करेंगे।”
“अभी धन कमा लें, सेवा बाद में करेंगे।”
“अभी संसार देख लें, भगवान को बुढ़ापे में याद करेंगे।”
लेकिन महाभारत का यह संदेश मानो पूछता है—
“तुम्हें किसने बताया कि तुम्हारे पास वह ‘बाद में’ आएगा?”
यही कलियुग की सबसे बड़ी शिक्षा है।
मृत्यु का स्मरण निराशा पैदा करने के लिए नहीं, जीवन के प्रति जिम्मेदारी पैदा करने के लिए है।
जिस व्यक्ति को यह पता हो कि अगला क्षण भी निश्चित नहीं, वह किसी से अनावश्यक द्वेष क्यों रखेगा? वह प्रेम को क्यों टालेगा? वह क्षमा करने में देर क्यों करेगा? वह माता-पिता के चरण छूने के लिए किसी विशेष दिन की प्रतीक्षा क्यों करेगा? वह किसी भूखे को भोजन कराने के लिए कल का इंतजार क्यों करेगा?
और सबसे महत्वपूर्ण—वह अपने भीतर भगवान को खोजने में देर क्यों करेगा?
इस दृष्टि से देखें तो कलियुग की अनिश्चित आयु स्वयं में एक आध्यात्मिक संदेश है—
“समय कम है या ज्यादा, यह तुम्हारे हाथ में नहीं; लेकिन उस समय का उपयोग कैसे करना है, यह तुम्हारे हाथ में है।”
इसलिए जीवन की लंबाई मत पूछिए।
यह पूछिए—
“जो समय मुझे मिला है, उसमें मैं कितना मनुष्य बन पाया?”
क्योंकि अंततः मृत्यु यह नहीं पूछेगी कि तुम्हारे पास कितना धन था, कितनी प्रसिद्धि थी या तुमने कितने वर्ष जीए। वह केवल यह प्रश्न छोड़ जाएगी—
“तुम्हें जो जीवन मिला था, तुमने उसके साथ किया क्या?”
और शायद यही संजय के उस प्राचीन वर्णन का सबसे आधुनिक संदेश है—
जीवन की गिनती वर्षों से नहीं, कर्मों से होती है; सांसों की संख्या से नहीं, उनके भीतर बसे सत्य, प्रेम और करुणा से होती है।
दासानुदास चेदीराज दास
हरे कृष्ण….
