शरीर बूढ़ा होता है, आत्मा नहीं—फिर हमें वृद्धावस्था से इतना भय क्यों?
बचपन में हम बड़े होने के लिए बेचैन रहते हैं और बुढ़ापे में फिर से जवान होने के लिए!
अजीब है न मनुष्य भी?
बचपन में आईने के सामने खड़े होकर सोचता है—कब बड़ा होऊँगा?
जवानी आती है तो लगता है—बस यही उम्र हमेशा बनी रहे।
और जैसे ही चेहरे पर झुर्रियाँ दिखाई देने लगती हैं, बालों में सफेदी उतरती है, शरीर पहले जैसा साथ नहीं देता, तो हम आईने से ही नाराज़ हो जाते हैं।
लेकिन कभी आईने से यह पूछने की कोशिश की—
“जिसे तुम बूढ़ा दिखा रहे हो, क्या वास्तव में वह ‘मैं’ हूँ?”
यहीं से आध्यात्मिक यात्रा शुरू होती है।
जिस शरीर को लेकर हम इतने चिंतित हैं, वह तो हर क्षण बदल रहा है। बचपन का शरीर कहाँ है? वह चेहरा कहाँ है? वह कद कहाँ है? वह ऊर्जा कहाँ है?
फिर भी हम कहते हैं—
“मैं वही हूँ।”
बचपन गया, जवानी आई।
जवानी गई, बुढ़ापा आया।
शरीर बदलता रहा, लेकिन भीतर बैठा “मैं” कहता रहा—मैं वही हूँ।
तो फिर जरा ठहरकर सोचिए—
बदला कौन और बचा कौन?
शरीर बदलता रहा और हम उसे अपना कहते रहे—“मेरा शरीर।”
यही दो शब्द आध्यात्मिक ज्ञान का दरवाजा खोल देते हैं—
मेरा शरीर।
जिसका शरीर “मेरा” है, वह शरीर “मैं” कैसे हो गया?
हम कहते हैं मेरा घर, मेरी गाड़ी, मेरे कपड़े, मेरा धन। हम जानते हैं कि इन वस्तुओं का स्वामी उनसे अलग है।
लेकिन शरीर के मामले में हम सबसे बड़ा भ्रम पाल लेते हैं।
हम कहते हैं—मेरा शरीर, और फिर अगले ही क्षण भूल जाते हैं कि “मेरा” कहने वाला कौन है।
श्रीकृष्ण अर्जुन को इसी सत्य की याद दिलाते हैं कि जिस प्रकार शरीर में रहने वाला जीव बाल्यावस्था से युवावस्था और फिर वृद्धावस्था को प्राप्त होता है, उसी प्रकार शरीर बदल जाने पर भी जीव का अस्तित्व समाप्त नहीं होता।
अर्थात वृद्धावस्था कोई दुर्घटना नहीं है।
वह शरीर की यात्रा का स्वाभाविक पड़ाव है।
फिर हम उससे इतना डरते क्यों हैं?
क्योंकि हमने अपनी पहचान शरीर से जोड़ ली है।
बाल सफेद हुए तो लगा—मैं बूढ़ा हो गया।
चेहरे पर झुर्रियाँ आईं तो लगा—मैं समाप्त हो रहा हूँ।
शक्ति कम हुई तो लगा—मेरा महत्व कम हो गया।
लेकिन क्या कभी यह सोचा कि शरीर की शक्ति कम होना और जीवन का मूल्य कम होना—दो अलग बातें हैं?
शरीर कमजोर हो सकता है, चेतना नहीं।
आँखों की रोशनी कम हो सकती है, लेकिन भीतर देखने की क्षमता बढ़ सकती है।
पैर धीमे हो सकते हैं, लेकिन जीवन की समझ तेज हो सकती है।
चेहरे की चमक कम हो सकती है, लेकिन अनुभव का प्रकाश बढ़ सकता है।
वृद्धावस्था शरीर का संदेश है कि—
“अब बाहर की दौड़ थोड़ी कम करो और भीतर की यात्रा शुरू करो।”
लेकिन हमने इसका उल्टा कर दिया।
बुढ़ापे में भी वही दौड़—
और अधिक धन चाहिए,
और अधिक प्रतिष्ठा चाहिए,
और अधिक लोगों को प्रभावित करना है,
और अधिक अपनी बात मनवानी है।
जिस शरीर ने जीवनभर हमारा साथ दिया, उसी शरीर के अंतिम पड़ाव में भी हम उसे संसार की प्रतियोगिता में घसीटते रहते हैं।
कभी पद के पीछे, कभी प्रतिष्ठा के पीछे, कभी संपत्ति के पीछे और कभी इस चिंता में कि लोग हमारे बारे में क्या सोचेंगे।
और मृत्यु सामने खड़ी होकर शायद मुस्करा रही होती है—
“तुम जिस चीज को बचाने में लगे हो, वह तो वैसे भी बदलने वाली है।”
वृद्धावस्था हमें डराने नहीं आती।
वह हमें जगाने आती है।
वह कहती है—अब यह मत पूछो कि मैंने कितना कमाया?
पूछो—मैंने अपने भीतर कितना पाया?
अब यह मत पूछो कि कितने लोग मुझे जानते हैं?
पूछो—क्या मैं स्वयं को जानता हूँ?
अब यह मत पूछो कि मेरे पास क्या-क्या है?
पूछो—जब यह शरीर नहीं रहेगा, तब मेरे साथ क्या जाएगा?
यही वह मोड़ है जहाँ मनुष्य संसार से भागता नहीं, बल्कि संसार को सही दृष्टि से देखना शुरू करता है।
परिवार रहेगा, जिम्मेदारियाँ रहेंगी, समाज रहेगा। शरीर की सेवा भी करनी होगी। लेकिन भीतर यह बोध पैदा होगा कि—
मैं इन सबका उपयोग कर रहा हूँ; मैं इनमें से कोई भी वस्तु नहीं हूँ।
यही अंतर है भौतिक जीवन और आध्यात्मिक जीवन में।
भौतिक जीवन पूछता है—
“मेरे पास कितना समय बचा है?”
आध्यात्मिक जीवन पूछता है—
“जो समय बचा है, उसका उपयोग किसलिए करूँ?”
भौतिक जीवन वृद्धावस्था को क्षय मानता है।
आध्यात्मिक जीवन उसे परिपक्वता मानता है।
भौतिक जीवन कहता है—अब बहुत कुछ छूट रहा है।
आध्यात्मिक जीवन कहता है—अब बहुत कुछ समझ में आ रहा है।
शायद इसलिए जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जब शरीर सबसे अधिक अनुभव लेकर आता है, तब मनुष्य अक्सर अपने शरीर को लेकर सबसे अधिक चिंतित हो जाता है।
जबकि वृद्धावस्था शायद ईश्वर की ओर से आया हुआ एक निमंत्रण है—
“अब मुझे भी थोड़ा समय दो।”
युवावस्था में संसार हमें अपनी ओर खींचता है।
वृद्धावस्था हमें भीतर की ओर धकेलती है।
यही उसका सौंदर्य है।
इसलिए अगली बार आईने में अपने चेहरे की झुर्रियाँ देखकर दुखी मत होना।
उन झुर्रियों को अपने जीवन की लिखी हुई पंक्तियाँ समझना।
सफेद बालों को पराजय मत समझना।
उन्हें समय द्वारा दिया गया स्मरण समझना।
धीमे होते कदमों को अपमान मत समझना।
उन्हें यह संकेत समझना कि अब दौड़ से अधिक दिशा महत्वपूर्ण है।
और जब शरीर कहे—“अब मैं पहले जैसा नहीं रहा,”
तो भीतर से आवाज आनी चाहिए—
“मुझे पता है। क्योंकि तू मैं नहीं है।”
शरीर बूढ़ा होगा।
एक दिन शरीर समाप्त भी होगा।
लेकिन उस दिन से पहले यदि हमने यह जान लिया कि मैं शरीर नहीं, शरीर में रहने वाली चेतन आत्मा हूँ, तो शायद वृद्धावस्था भय का विषय नहीं रहेगी।
वह जीवन का सबसे सुंदर अध्याय बन सकती है।
क्योंकि तब मनुष्य उम्र नहीं गिनता—
अपने भीतर की दूरी घटाता है।
और अंततः सवाल यह नहीं कि—
“मैं कितने साल का हो गया?”
सवाल यह है—
“इन वर्षों में क्या मैं अपने वास्तविक स्वरूप के थोड़ा और करीब आया?”
क्योंकि शरीर की उम्र बढ़ना निश्चित है।
लेकिन आत्मा के प्रति हमारी जागृति—
यह अभी भी हमारे हाथ में है।
दासानुदास चेदीराज दास
