अखण्ड-भूमंडलाचार्य श्रीमद् वल्लभाचार्य-प्रधान पीठाधीश्वर अनंत श्रीविभूषित गो. तिलकायित श्री गोवंदलालजी महाराजश्रीने ‘श्रीयमुनाष्टकम्‘ की व्याख्या करने का मुझे आदेश दिया और इस आदेशको, मैंने, अपने स्वाभाविक भावना-भावित महोत्साहपूर्वक, स्वीकार किया। स्वीकार तो कर लिया, लेकिन मैंने अपने जीवन काल में, जन, प्रथम ही प्रथम‘ श्री यमुनाष्टक‘ देखा तो मुझे लगा कि मैं कुछ नहीं समझ सका, और जितनी बार यह भाव आया उतनी ही बार इस ग्रंथ-रत्न के पारायण किये। इस तरह से आचरित असकृत् अभ्यास रूप मंथन का परिणाम ही यह प्रस्तुत व्याख्या है। यह हिन्दी-व्याख्या, ‘श्री यमुनाष्टक‘ पर आलेखित पांचों विवृतियों की संदर्भानुसार सज्जीकृत पंक्तियों का अनुवाद मात्र है, साथ ही विवृतियों के अध्ययन से अंतःस्फुरित नूतन भावों की अभिव्यक्ति भी है अर्थात् विवृति-पंचक के सार समुदाय से यह पंचामृत रूप व्याख्या-रस निष्पन्न हुआ है। मेरा यह व्यक्तिगत अभिप्राय तब प्रमाणित हुआ, जब, पूज्य-चरण श्री महाराजश्रीने, इस व्याख्या को, प्रायः एक ही उपस्थिति में, आद्योपांत सुनकर, अपनी अंतः संतोषाभिव्यक्ति रूप में, मुझे उत्तमोत्तम साधुवाद से पुरस्कृत किया। आपत्री के प्रति मैं अपनी हार्दिक कृतार्थता प्रकाशित करता हूँ।
काव्य रमणीयार्थ का प्रतिपादक है। साक्षात् रमणीयत्व ही श्रीयमुनाष्टक का प्रतिपाद्य विषय है। यथास्थित-रूप-निरूपण को स्तुति कहते हैं, इस आशय में वेद-मंत्र स्तुति है। यहां ‘स्तुति‘ इसी अर्थ में प्रयुक्त हुई है, लौकिक अर्थ में नही . अतः, ‘श्रीयमुनाष्टकम्‘ मंत्र है। श्रीमद् आचार्य-चरण इसके ऋषि है। पृथ्वी छंद है। हरि-प्रिया कालिन्दी इसकी देवता है। ‘रसो वै सः‘ बीज है। प्रभु संबंध संपादन में उपस्थित अन्तरायके निवारक श्रीमुररिपुकी प्रीति में विनियोग है। लीला सामयिक प्रभु-श्रम-जलाणुओं से संगम ही सिद्धि है।
श्रीमद्-आचार्य-चरण ने अपने संप्रदाय के सिद्धान्तों को स्पष्ट समझाने के लिये कुल षोडश ग्रंथों की रचना की है। इन ग्रंथों के अध्ययन से आपश्री द्वारा प्रतिपादित पुष्टि मार्गोक्त-भक्ति-योग का, तथा उसके दार्शनिक-स्वरूप का स्पष्ट बोध हो सकता है। षोडश ग्रंथों में‘ श्री यमुनाष्टकम्‘ आपश्री की सर्व प्रथम रचना है। इस लिये यह स्तोत्रशिरोमणि, उपरोक्त ग्रंथों के प्रारंभ का समुपयुक्त मंगलाचरण है। भगवद्-रतिके अमृत-द्रव से परिपूर्ण मंगलमय-स्वर्णं-कुंभ की स्थापना रूप है।
श्रीमद्-आचार्य-चरण ने विविध जीवों का विवेचन किया है-पुष्टि-जीव, मर्यादा-जीव तथा प्रवाही-जीव। पुष्टि-जीव, भगवदीय कहे जाते हैं, और इनकी सृष्टि, भगवदीय-सृष्टि। श्रीयमुनाष्टक में, ज्ञान-मार्गोक्त सर्वज्ञता अथवा मोक्ष के स्वरूप का विवेचन नहीं है, इस में योग सूत्रोक्त सिद्धियों की चर्चा नहीं की गयी है, इसमें कर्म-मार्गोक्त धर्म, अर्थ और काम का निरूपण नहीं हुआ है। इसमें उसभगवदीय-सृष्टि का वर्णन मिलता है जो अपने में यह सब कुछ समाकर सभी से विरल एवं विलक्षण है। इस सृष्टि के जीवों का एकमात्र धर्म है-हरि का स्मरण और भजन, अर्थ है-हरि की प्रीतिः, काम है-हरि दर्शन की लालसा, मोक्ष है-हरिके परम आनंदमय स्वरूप की अनुभूति। भरावदीयत्व ही सर्व पुरुषार्थों की उपलब्धि रूप है‘ भगवदीयत्वेन परिसमाप्तसर्वार्थाः ।‘
श्रीयमुना इसी भगवदीय सृष्टि की सर्वेश्वरी है। प्रभु को यह सृष्टि अत्यन्त प्रिय है-‘नाहमात्मनमाशासे मद्-भक्तैः साधुभिर्विना‘। प्रभु की इसी प्रिय-सृष्टि को, अपने भक्तानुगुणत्व-धर्म से श्रीयमुना संपूर्णतः सम्पन्न रखती है। प्रभु के प्रियत्व की संपादिका श्रीयमुना, उनको अंतरंग ‘प्रि-वयस्या‘ है। निःसाधन-फलात्मिका होने के कारण, वह, भगवदीय समाज की भी परम-नेहास्पदा है। प्रस्तुत स्तोत्र में, इसी ‘उभयोपकारिणी‘ श्री यमुनाकी नाम-रूपमयी अनुभूति करायी गयी है। यह अनुभूति, तत्सुलभरसमयता, तनु-नवत्व की उपलब्धि के उपरांत ही संपाद्य हो सकती है। लौकिक द्वारा अलौकिक का ग्रहण असंभव है। तथापि, जब तक देह में अलौकिकत्त्व का आधान न हुआ हो, तब तक इस स्तोत्र के पारायण-परायण को ‘दुरित अर्थात् दोष क्षय‘ का मुक्त आशीर्वाद श्रीमद्-आचार्य-चरण ने दिया है। भगवदीय सृष्टि में, अर्थात् पुष्टि-सृष्टि में निर्दोष जीव हो अंगीकृत होते हैं। अतः इसमें प्रवेशाधिकार ‘श्रीयमुनाष्टक‘ द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।
‘श्रीयमुनाष्टक‘ के पांच भाष्यकार है। ये सभी मद्-आचार्य-चरण के वंशज एवं उद्भट विद्वान् थे। स्वनामधन्य श्रीविठ्ठलेशजी ने‘ श्रीयमुनाष्टक‘ को अपनी उत्तमोत्तम ‘विवृति‘ से विभूषित किया है। आपश्री ने षष्ठ श्लोक-पर्यंत ही विवृति लिखी है। अंतिम श्लोक-त्रय की विवृति को उनके चतुर्थ-पुत्र श्री गोकुलनाथजी ने लिखकर निवेदित की थी। श्री हरिरायजी, श्री पुरुषोतमजी तथा श्री द्वारकेशजी-इस विद्वत्-त्रयी ने, श्रीमत्प्रभुचरण तथा श्री गोकुलनाथजी की विवृत्ति ऊपर यथाक्रम अपनी टिप्पणी, विवृति-विवरण तथा विवृति-टिप्पण लिखे हैं। तदुपरांत, श्रीमत्प्रभुचरण एवं श्री हरिरायजी द्वारा स्वतंत्रतया विरचित क्रमशः ‘श्रीयमुनाष्टपदी‘ तथा ‘ श्रीयमुना विज्ञप्ति‘ स्तोत्र भी उपलब्ध है।
इसके अतिरिक्त, संस्कृत वाङमय में, श्रीयमुना के अनेकों स्तोत्र हैं जिनमें आद्य शंकराचार्य तथा रूपगोस्वामी विरचित स्तोत्र विशेष प्रसिद्ध हैं। इन स्तोत्रओं में श्रीयमुना के आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक स्वरूप का ही प्रायः अधिक परिचय दिया गया है। श्रीमद् आचार्य चरण के ‘श्रीयमुनाष्टक‘ में केवल आधिदैविक-स्वरूपा श्रीयमुना ही अवतरित हुयी है। इसमें श्रीयमुना अपने त्रिभुवनाद्भुत सौंदर्य से प्रकट है-अपने परम उपकारकत्त्व एवं कृपालुत्त्व धर्मो सहित प्रत्येक श्लोक मानों श्रीयमुना की स चेतन उपस्थिति है।
श्रीमद् आचार्य चरण, ब्रह्म-वाद के एकांत प्रतिपादक थे ‘सर्व खल्विदं ब्रह्य‘-‘जीवजडात्मकं सर्वमहमेव अयं मुख्यो ब्रह्मवादः ‘यह सब कुछ साक्षात् ब्रह्म है-जीवजड़ात्मक सब कुछ मैं ही हूँ‘ यह ज्ञान मुख्य ब्रह्मवाद है। अतः श्रीमद् आचार्य-चरण को, जल-प्रवाहमयी आधिभौतिक-स्वरूपा यमुना की प्रतीति होती हो-कैसे? उनके लिये यह तो श्रीमुकुन्दप्रिया, द्रविभूत सात्मिका साक्षात् सूर्य-पुत्री श्रीयमुना ही है। प्रस्तुत संपूर्ण अष्टक को गहनतापूर्वक विचारने से यह स्पष्ट प्रतीत हो जायेगा कि इसमें कहीं भी श्रीयमुना के नदीत्व-भौतिक-स्वरूप-सूचक पदावलि का प्रयोग ही नहीं हुआ ।।। पुलिन के निकट जो सिकता-कण चकचकित हो रहे हैं-वह केवल लोक-प्रतीति है-वस्तुतः वह मुक्ता है, लहरें, वस्तुतः भुजायें है, तट, वस्तुतः नितंब हैं। एक स्थल पर ‘पयःपानतः शब्दों का प्रयोग हुआ है, किन्तु वहाँ पयः शब्द का अर्थ दूध है, पानी नहीं, इसी लिये औयमुना का पयःपान मुख से किया जाता है, अंजलि से नहीं। अंजलि से पानी पीया जाता है, दूघ नहीं।‘ श्रीयमुनाष्टकम्‘ में नदीस्वरूपा श्री यमुनाका वर्णन नहीं है, किन्तु मुकुंद-रति-वर्धिनी आधिदैविक-स्वरूपा श्रीयमुना का संकीर्तन है। श्री यमुना के इसी आधिदैविक स्वरूप का स-प्रमाण प्रतिपादन श्री पुरुषोत्तमजी ने अपनी ‘विवृति-विवरण‘ में पांडित्योचित शैली से किया है।
‘श्रीयमुनाष्टक स्तोत्र में तो ‘सघोष गतिदंतुरा‘ श्रीयमुना का संकीर्तन हुआ है, अभिसारपरायणा, रणन्-मंजीर-मंजुला श्री यमुना का, जो रोमांचित है, क्वणत्-केयूर-कंकणा, सुश्रोणी-तटा श्री यमुना का, जिसे गमन-मात्र की ही स्फूर्ति है, दोलाधिरोहण की प्रतीति ही नहीं !!! व्रज-सुंदरी-वृंद सहित प्रभु के रति-श्रम-रस से ओत-प्रोत त्रीयमुना का, जो स्व-सेवक को ‘तनु-नवत्व‘ से सम्पत्र करती है और जो सकल-सिद्धियों की प्रदात्री है।
आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
श्रीजगन्नाथधाम काली मंदिर के पीछे ग्वालटोली
नर्मदापुरम मध्यप्रदेश मोबाइल 9993376616
