सूचना का अधिकार आज खुद ही सांस के लिए संघर्ष कर रहा है और सरकार मूक दर्शक बनी हुई है। जो कानून आम आदमी को अफसर से सवाल पूछने की ताकत देता था, वह आज खुद अपनी सुनवाई का इंतजार कर रहा है। आंकड़े डराने वाले हैं। देश में उनतीस सूचना आयोग हैं, एक केंद्रीय और अट्ठाईस राज्यों के। जून, 2025 तक इन सभी में कुल चार लाख तेरह हजार नौ सौ बहत्तर अपील और शिकायतें पेंडिंग थीं। केंद्रीय सूचना आयोग की ही बात करें तो एक फरवरी, 2026 में सरकार ने राज्यसभा में बताया कि वहां उनतीस हजार चौंतीस अपील और तीन हजार पांच सौ सतहत्तर शिकायतें यानी कुल बत्तीस हजार छह सौ ग्यारह मामले लंबित हैं। अगस्त, 2026 में यह संख्या चालीस हजार पार कर गई, जब छत्तीस हजार तीन सौ पचास अपील और तीन हजार सात सौ तैंतीस शिकायतें पोर्टल पर दिखीं। इसका सीधा अर्थ है कि जिस व्यक्ति ने गांव के हैंडपंप, राशन कार्ड या छात्रवृत्ति के बारे में जानकारी मांगी, उसकी दूसरी अपील की सुनवाई दो साल बाद होगी। तब तक अधिकारी रिटायर हो चुका होगा और सवाल बेमानी हो जाएगा।
यह भीड़ मामलों की अधिकता से नहीं, कुर्सियां खाली रखने से बनी है। सरकार की सबसे बड़ी गैर जिम्मेदारी नियुक्तियां न करना है। अक्टूबर,2025 में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बताया गया कि केंद्रीय सूचना आयोग में चीफ का पद 14 सितंबर, 2025 से खाली है और दस में से आठ आयुक्तों के पद खाली हैं। दस में से आठ कुर्सियां खाली हों तो काम कैसे चलेगा। राज्यों में स्थिति और खराब है। जुलाई, 2024 से अक्टूबर, 2025 के बीच 29 में से छह आयोग अलग अलग अवधि में पूरी तरह बंद रहे क्योंकि वहां कोई आयुक्त ही नहीं था। हिमाचल प्रदेश और झारखंड अक्टूबर, 2025 तक बंद थे। जब आयोग ही बंद रहेगा तो नागरिक कहां जाएगा। दूसरी वजह है पुरानी कार्यपद्धति। एक आयुक्त साल में औसतन अट्ठाईस सौ मामलों का निपटारा करता है, जबकि हर साल 30,000 से ज्यादा नए मामले आ जाते हैं। एक गड्ढा भरते ही दो नए खुद जाते हैं। इस गति से पेंडेंसी कभी खत्म नहीं होगी। कई राज्यों में सुनवाई में दो साल लग रहे हैं।
तीसरी वजह सबसे गंभीर है और वह है सरकार की मंशा। आरटीआई कानून की धारा चार एक बी में लिखा है कि हर विभाग को 17 तरह की जानकारी खुद ही वेबसाइट पर डालनी होगी। बजट, वेतन, विदेश यात्रा, सरकारी गाड़ी, बंगला, ठेके, सब्सिडी के लाभार्थी, सब कुछ। इसे स्वतः प्रकटीकरण कहते हैं। सोच यह थी कि जानकारी पहले से सार्वजनिक होगी तो आरटीआई की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। पर हकीकत में अस्सी फीसदी से ज्यादा विभाग इसका पालन नहीं करते। वेबसाइट पर दस साल पुराना डेटा पड़ा है या कुछ है ही नहीं। नतीजा एक ही सवाल पर हजारों आरटीआई आती हैं और आयोग दब जाता है। यह बोझ सरकार ने खुद बनाया है।
चार लाख से अधिक पेंडिंग मामले सिर्फ फाइल नहीं, चार लाख लोगों के टूटे भरोसे की कहानी हैं। इसी कानून से आदर्श सोसाइटी, कॉमनवेल्थ, टू जी जैसे घोटाले उजागर हुए। इसी से गरीब की पेंशन, छात्र की कॉपी, किसान का मुआवजा जैसे सवालों के जवाब मिले। जब सुनवाई दो साल बाद होगी तो अधिकारी को डर ही नहीं रहेगा। वह सोचेगा जानकारी रोक लूं, अपील होगी, दो साल टलेगा, तब तक मेरा तबादला हो जाएगा। यह डर खत्म होना भ्रष्टाचार की जीत है। सरकार अक्सर दुरुपयोग का आरोप लगाती है, पर सच्चाई यह है कि वह दुरुपयोग के बहाने उपयोग को ही खत्म कर रही है। नियुक्ति न करना, बजट न देना, स्टाफ न देना, यह कानून को बिना रद्द किए मारने की रणनीति लगती है।
इसे ठीक करने के लिए पांच ठोस कदम जरूरी हैं। पहला, नियुक्ति का तय कैलेंडर बने। जैसे यूपीएससी और चुनाव आयोग का कैलेंडर होता है, वैसे ही आयुक्तों का भी हो। कार्यकाल खत्म होने से तीन महीने पहले विज्ञापन निकले। पद तीस दिन से अधिक खाली रहे तो संबंधित सचिव की जवाबदेही तय हो। दूसरा, आयुक्तों की संख्या बढ़े और बेंच सिस्टम शुरू हो। दस आयुक्तों से पूरे देश का बोझ नहीं संभलेगा। संख्या पंद्रह की जाए और दो आयुक्तों की बेंच से सुनवाई हो ताकि रफ्तार बढ़े। तीसरा, धारा चार को असली आरटीआई बनाया जाए। हर विभाग को सत्रह बिंदुओं की जानकारी हर तीन महीने में अपडेट करनी अनिवार्य हो। इसका हर साल बाहरी एजेंसी से ऑडिट हो और रैंकिंग सार्वजनिक हो, जैसे स्वच्छता रैंकिंग होती है। सबसे खराब रैंक वाले विभाग के प्रमुख पर कार्रवाई हो। अगर जानकारी पहले से वेबसाइट पर होगी तो पचास फीसदी आरटीआई खुद ही खत्म हो जाएंगी।
चौथा, सुनवाई पूरी तरह ऑनलाइन और समयबद्ध हो। आज भी लोगों को सैकड़ों किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग स्थायी हो और कानून में तय हो कि दूसरी अपील का निपटारा नब्बे दिन में होना ही चाहिए, जैसे उपभोक्ता अदालत में है। पांचवां, जुर्माने का डर वापस लाया जाए। धारा बीस में जन सूचना अधिकारी पर ढाई सौ रुपये रोजाना, अधिकतम पच्चीस हजार रुपये जुर्माना लगाने का प्रावधान है, पर आयोग इसका प्रयोग न के बराबर करते हैं। जब तक जेब से पैसा जाने का डर नहीं होगा, अधिकारी जानकारी नहीं देगा।
आरटीआई को कमजोर करने का असर केवल आयोग पर नहीं, पूरी शासन व्यवस्था पर पड़ता है। जब जानकारी समय पर नहीं मिलती तो योजनाओं में गड़बड़ी छुप जाती है। मनरेगा में मजदूरी, अस्पताल में दवा खरीद, स्कूल में मिड डे मील का हिसाब, सब कुछ अंधेरे में चला जाता है। गांव का आदमी थक कर चुप हो जाता है। यही चुप्पी सिस्टम चाहता है। सरकार को समझना होगा कि कई विभाग आरटीआई को टालने के लिए आवेदक को एक विभाग से दूसरे विभाग में भेजते हैं, धारा छह तीन के नाम पर तीस दिन और बढ़ा देते हैं। कई बार व्यक्तिगत जानकारी, धारा आठ एक जे का हवाला देकर हर सवाल को निजी बता दिया जाता है। मेडिकल बिल जैसी निजी जानकारी और सार्वजनिक खर्च में फर्क करना जरूरी है। अगर कुल खर्च बताया जाए तो निजता भी बचेगी और पारदर्शिता भी।
सुधार तभी संभव है जब सरकार इसे बोझ नहीं, मदद समझे। जो अधिकारी ईमानदार है, उसे तो आरटीआई से मदद मिलती है क्योंकि वह कह सकता है कि देखिए सब कुछ वेबसाइट पर है। जो बेईमान है, उसे ही डर लगता है। इसलिए ईमानदार अधिकारियों को पुरस्कृत किया जाए और धारा चार का पालन न करने वालों पर कार्रवाई हो। केंद्रीय सूचना आयोग की वेबसाइट पर हर विभाग की रैंकिंग, ऑडिट रिपोर्ट और लंबित मामलों की रोज की स्थिति लाइव दिखनी चाहिए ताकि जनता खुद निगरानी कर सके। आरटीआई किसी एक दल का कानून नहीं, जनता का कानून है। इसने आम आदमी को कलेक्टर के दफ्तर में जाकर हिसाब मांगने की हिम्मत दी। चार लाख तेरह हजार नौ सौ बहत्तर मामले यह बताते हैं कि जनता अब भी सवाल पूछना चाहती है, पर सरकार जवाब देने को तैयार नहीं। अगर सरकार पारदर्शिता की बात सच में मानती है तो उसे पहले सूचना आयोगों को जिंदा करना होगा, उन्हें स्टाफ, बजट और ताकत देनी होगी। नहीं तो इतिहास लिखेगा कि एक कानून था जिसने राजा से सवाल पूछने की ताकत दी थी और सरकार ने कुर्सियां खाली रखकर उस कानून को मार दिया।
डॉ. शैलेश शुक्ला
गृह मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा ‘राजभाषा गौरव पुरस्कार’ से सम्मानित
वैश्विक समूह संपादक, सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह
सलाहकार संपादक, गौड़सन्स टाइम्स
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