पुरुषोत्तम यादव हिनवार
(गोपराष्ट्र के वैदिक क्षत्रिय ग्वाल)
यह पूजा श्रावण शुक्ल पक्ष की चौदस को की जाती है यह पूजा केवल ग्वालों में की जाती है। जाख का कोई स्थान या चिन्ह नहीं होता बल्कि पांच पौधे (पलाश,आक,बोबई,बेर,अपमार्ग) के समूह को ही जाख बाबा कहते हैं।इन पौधों को राखी बांधकर खीर पूरी पकवान आदि से पूजा करते हैं। यह पूजा प्रकृति के प्रति समर्पण भाव को दर्शाती हैं।चूंकि हमारे पूर्वज घुमंतू और पशुपालक थे और पशुपालन प्रकृति पर निर्भर करता था। प्रकृति ने सदैव हमारे पशुओं की रक्षा की है। इसलिए प्रकृति के प्रति सम्मान के भाव व्यक्त करने लिए हम लोग जाख बाबा को रक्षा सूत्र बांधते हैं। ब्रज भाषा और सूर शब्दकोश में जाख का अर्थ कुल देवता हैं। यदि जाख का अर्थ कुल देव हैं तो जाख बाबा या देव का मूल रूप क्या हैं? इसे जानने लिये हमें जाख शब्द की उत्पत्ति विषयक शब्दों की ओर ध्यान देना होगा। जाख शब्द का मूल यक्ष है जो भाषाभेद के कारण यक्ष,यछ,जख जाक्ष,जाख,जाक हो गया। ब्रज क्षेत्र में कई स्थानों पर जाख देव के पूजा स्थान मिल जायेंगे। जाख देव का नाम मणिभद्र यक्ष हैं। यह(यक्ष) रक्षक देव होते हैं। जो पशुधन और वैश्यों के रक्षक देव के रूप में प्रसिद्ध थे। मनुस्मृति,ब्रह्मवैवर्त पुराण आदि के अनुसार ग्वाल वैश्य जाति में मुख्य हैं। सूरदास जी ने अपनी कृति श्रीकृष्ण बाल-माधुरी में जाख का वर्णन किया हैं।-
228. जसुदा! तेरौं मुख हरि जोवै
जसुदा! तेरौं मुख हरि जोवै ।
कमलनैन हरि हिचिकिनि रोवै, बंधन छोरि जसोवै ॥
जौ तेरौ सुत खरौ अचगरौ, तउ कोखि कौ जायौ ।
कहा भयौ जौ घर कैं ढोटा, चोरी माखन खायौ ॥
कोरी मटुकी दह्यौ जमायौ, जाख न पूजन पायौ ।
तिहिं घर देव-पितर काहे कौं , जा घर कान्हर आयौ ॥
जाकौ नाम लेत भ्रम छूटे, कर्म-फंद सब काटै ।
सोई इहाँ जेंवरी बाँधे, जननि साँटि लै डाँटै ॥
दुखित जानि दोउ सुत कुबेर के ऊखल आपु बँधायौ ।
सूरदास-प्रभु भक्त हेत ही देह धारि कै आयौ ॥
भावार्थ / अर्थ :– (गोपियाँ कहती हैं-) ‘यशोदाजी ! श्याम तुम्हारा ही मुख देख रहा है ।
कमललोचन मोहन हिचकी ले-लेकर रो रहा है, यशोदाजी! (झटपट इसका) बन्धन खोल दो ।
यदि तुम्हारा पुत्र सचमुच उधमी है, तो भी वह उत्पन्न तो हुआ है तुम्हारे ही पेटसे
न? क्या हो गया जो घरके लड़केने चोरीसे मक्खन का लिया । (देखो तो मैंने ही) कोरी
मटकीमें दही जमाया था, कुल-देवता भी पूजने नहीं पायी थी (कि उसने झूठा कर दिया,
पर मैं क्या क्रोध करती हूँ? अरे) उस घरमें किसके देवता और किसके पितर, जिस घरमें
कन्हैया आ गया, जिसका नाम लेनेसे अज्ञान दूर हो जाता है, कर्म के जालको काट देता
है, उसीको माताने रस्सीसे बाँध दिया है और ऊपरसे छड़ी लेकर डाँट रही है । सूरदासजी
कहते हैं कि मेरे प्रभु तो भक्तोंके लिये ही शरीर धारण करके संसारमें आये हैं;
उन्होंने कुबेरके दोनों पुत्रोंको दुःखी समझकर (उनके उद्धारके लिये) अपनेको ऊखलसे
बँधवा लिया है ।
जाख देव की पूजा पेड़ पौधे के रूप में नंदबाबा के काल में शुरू हुई क्योंकि मणिभद्र कुबेर के ही पुत्र थे जो श्राप के कारण पेड़ बन गए थे। धीरे धीरे समय काल परिस्थिति अनुसार कृष्णकाल में यह पूजा पांच पौधों में परिवर्तित हो गई। क्योंकि उस समय ग्वालों के रक्ष देव पंचवृष्णि(बलराम,कृष्ण,प्रद्युम्न,साम्ब और अनिरुद्ध) हो गए और ग्वालों ने इन्ही पौधों को पंचवृष्णि, पंचदेव, पंचमहाभूत और पंचपरमेश्वर माना। साथ ही ग्वालों ने इन पांच पौधों के पशु चिकित्सा में उपयोगिता को समझकर इनको पूजा पद्धति में शामिल किया।
पौधों के चिकित्सीय गुण –
1.आँख रोग- मदार ( आक ) १० ग्राम , गन्ने के शीरे की सात बून्द डालकर मिला लें। रविवार के दिन दूध में अंगुली भिगोकर भीगी हूई अंगुली से पशु की आँख के चारों ओर अंगुली से सात चक्कर बना दे । ध्यान रहे चक्कर बनाते समय अंगुली न उठे । इस प्रकार दवा लगाने से जहाँ चक्कर बनाये थे वहाँ से बाल व खाल उड़ जायेंगे और फूली में आराम आ जायेगा ।
2.गर्भधारण -पलास ( ढाक) के पत्तों के पास की गाँठ के २ नग लेकर रोटी में रोगी पशु को ४ दिन तक रोज़ सुबह पिलायें ।
3.वन तुलसी- जब गाय अथवा भैंस के शरीर पर छोटी-छोटी फुंसियां अथवा फोड़े हो जाते हैं तो वन तुलसी,बोबई अथवा राम तुलसी को शरीर पर लगाने से यह फुंसी अथवा फोड़े सही हो जाते हैं,साथ ही बरसात के समय मच्छर अथवा बरसाती कीड़े को दूर रखने के लिए इस तुलसी का विशेष प्रयोग किया जाता है।
4.गर्भ जन्य समस्या-अपमार्ग -चिरचिटा ( अपामार्ग ) के पत्ते तोड़कर उन्हें रगड़कर बत्ती बनाकर गाय – भैंस के सींग व कानों के बीच में इस बत्ती को फँसा कर ,माथे के ऊपर से लेकर कान व सींगों के बीच से कपड़ा लेते हुए सिर के ऊपर गाँठ बाँध देवें , गाय तीन चार घंटे में ही जेर डाल देगी ।
5.बेर- जब गाय या भैंस के किसी कारण से सींग टूट जाते हैं तो देर और नीम के रस को बराबर मात्रा में मिलाकर सींग की जगह पर लगाने से पशु को आराम मिलता है। जब पशु को चेचक रोग हो जाता है तो बेर के पत्ते एवं छाल का काढ़ा बनाकर पशु करो पिलाने से रोग का वेग कम होता है और पशु धीरे-धीरे सही हो जाता हैं।(यह चिकित्सा प्राचीन शास्त्रों में वर्णित हैं और इस लेख में केवल जानकारी देने के उद्देश्य के लिखी गई हैं। कृपया इनका उपयोग केवल पशु चिकित्सक के परामर्श अनुसार ही करें)
गौतम बुद्ध के मथुरा आगमन के समय भी जाख पूजा का वर्णन हमें इतिहास में मिलता हैं
लोकमान्यतानुसार इन पांच पौधों की पूजा इसलिए की जाती है क्योंकि एक समय भयंकर बाढ़ आने के कारण ग्वालों के पशुधन बाढ़ में बह गए और इन पांच पौधों को एक साथ पकड़कर ग्वालों ने पशुओं को बचा लिया यह समय रक्षाबंधन की पूर्व संध्या था इसलिए उसी दिन से रक्षाबंधन की पूर्व संध्या जाख बाबा की पूजा की जाती है।
एक और लोक मान्यता के अनुसार एक बार ग्वाल समाज पर विपत्ति आन पड़ी थी। गाँव के सभी ग्वाले मर गए केवल एक लड़की बची जिसका गोत्र दुबेला था और जिसका रियार गोत्र में विवाह हुआ था। जब वह लड़की गर्भवती थी और प्रसव पीड़ा से परेशान होकर उसने जंगल में पर्दा करने के लिए इन 5 पौधों का सहारा लिया और उस बालिका को प्रसव हो गया और बच्चे की रोने की आवाज वहां से गुजर रहे गुर्जर ने सुनी और वह उस लड़की और नवजात शिशु को अपने घर ले गया और अपनी धर्म बहन बना लिया उस कन्या ने सावन मास की चौदस को पांचों पौधों को लाकर गाय के खूंटी से बांधकर पहली राखी जाग बाबा को बांधी और खीर पुरी धूप दीप और नैवेद्य आदि से पूजा कि अगले दिन (रक्षाबंधन के दिन)प्रातः अपने धर्म भाई गुर्जर को राखी बांधी।
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विधि सलाहकार -सौरभ यादव पडरिया
