देवेन्द्र सिंह यादव
भारतीय संविधान के अंतर्गत प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना गया है। शासन की नीतियों, योजनाओं और प्रशासनिक निर्णयों को जन-जन तक पहुँचाने तथा समाज की वास्तविक जमीनी तस्वीरों को प्रशासन तक लाने का यह माध्यम जितना पवित्र है, उतना ही उत्तरदायित्वपूर्ण भी है। इस दोतरफा संवाद को जीवंत बनाए रखने के लिए ही जिला स्तर पर जिला जनसंपर्क कार्यालय (DPRO) की स्थापना की गई है। यह कार्यालय किसी एक व्यक्ति की जागीर नहीं, बल्कि जनता के टैक्स से चलने वाला वह प्रशासनिक केंद्र है, जिसका मुख्य धर्म हर वैध, सक्रिय और मैदानी पत्रकार तक सूचनाओं का निर्बाध प्रवाह सुनिश्चित करना है।
किंतु वर्तमान में नर्मदापुरम जिले से जो स्थितियाँ सामने आ रही हैं, वे गंभीर आत्ममंथन की मांग करती हैं।
‘समाचार पत्र की नियमितता’ का तर्क बनाम मैदानी हकीकत का सच:
अक्सर कार्यालय स्तर से यह तर्क सुनने को मिलता है कि संबंधित समाचार पत्र की नियमित प्रतियां कार्यालय में प्राप्त नहीं हो रही हैं, इसलिए प्रेस रिलीज या जीमेल सूची (Gmail List) में नाम शामिल नहीं किया जा रहा है। यहाँ यह विधिक और तार्किक प्रश्न खड़ा होता है कि क्या जनसंपर्क कार्यालय का दायित्व केवल कागजी प्रतियां गिनना है या मैदानी स्तर पर जनता की आवाज उठाने वाले हर उस पत्रकार का सहयोग करना है जो वैध नियुक्ति पत्र और अपने संस्थानों के पुख्ता दस्तावेजों के साथ कार्य कर रहा है?
आज पत्रकारिता के आयाम बदल चुके हैं। प्रिंट मीडिया के साथ-साथ डिजिटल पोर्टल, वीडियो प्लेटफॉर्म्स और स्वतंत्र माध्यमों के जरिए खबरें पलक झपकते जनता तक पहुँच रही हैं। ऐसे में, केवल तकनीकी या कार्यालयीन औपचारिकताओं का दायरा खींचकर जमीन पर पसीना बहाने वाले पत्रकारों को सूचनाओं से वंचित रखना—कहाँ तक न्यायसंगत है?
फंड, कर्तव्य और प्रशासनिक जवाबदेही का गणित:
शासन द्वारा जनसंपर्क और प्रचार-प्रसार के लिए प्रतिवर्ष ट्रेजरी नियमों के तहत एक निश्चित बजट (फंड) आवंटित किया जाता है। इस फंड का उद्देश्य जिले के हर कोने तक विकास कार्यों और प्रशासनिक सूचनाओं का प्रसार करना है। जब शासकीय धन का उपयोग सूचनाओं के पारदर्शी वितरण के लिए हो रहा है, तो फिर चुनिंदा लोगों तक ही सूचनाएं सीमित क्यों रहें?
यदि कोई कार्यालय या अधिकारी अपने स्वेच्छाचारिता के कारण वैध पत्रकारों के नाम सूची से बाहर रखता है या जानबूझकर जीमेल ग्रुप में नहीं जोड़ता है, तो यह प्रशासनिक शिथिलता की श्रेणी में आता है। कानून और प्रशासनिक आचरण नियमों के तहत, पद पर रहते हुए किसी पात्र व्यक्ति के अधिकारों का हनन करना या पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाना भविष्य में गंभीर विभागीय जांच, प्रशासनिक आपत्ति और वैधानिक निगरानी का कारण बन सकता है। कोई भी अधिकारी कानून से ऊपर नहीं होता; आज की गई छोटी सी लापरवाही कल प्रशासनिक और विधिक कार्रवाइयों का बड़ा आधार बन जाती है।
सुधार ही सबसे बड़ा समाधान (एक सकारात्मक पहल):
यह आलेख किसी के प्रति द्वेष या व्यक्तिगत आलोचना के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था को उसकी मूल पटरी पर लाने के लिए एक निष्पक्ष वैचारिक आईना है। हम सब का उद्देश्य एक ही है—नर्मदापुरम का विकास, भ्रष्टाचार पर अंकुश और शासन की योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचना।
यदि जिला जनसंपर्क कार्यालय अपनी कार्यप्रणाली में थोड़ा लचीलापन और सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए, सभी वैध और सक्रिय मैदानी पत्रकारों के दस्तावेजों का सत्यापन कर उन्हें आधिकारिक सूची व जीमेल ग्रुप में स्थान देता है, तो इससे न केवल प्रशासन की पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि मीडिया और शासन के बीच का समन्वय भी अटूट होगा।
आइए, संकीर्ण दायरों से ऊपर उठकर लोकतंत्र की इस निष्पक्ष यात्रा को और अधिक मजबूत करें, ताकि हर सजग पत्रकार अपनी कलम पूरी ऊर्जा और स्वाभिमान के साथ देश और समाज के हित में चला सके
