नर्मदापुरम में एक ओर धुनिवाले दरबार के अनुयायी दादागुरु संत के कई सालों से निराहार होने से उनकी आध्यात्मिक साधना की कृपादृष्टि पाने वाले उनके कुछ खास भक्त शहरभर में गली चौराहों पर पोस्टरों में प्रचार का मायाजाल बिछा रहे है ओर उनके साथ उनके फोटो ओर नामावली का प्रचार से खुदकों उनके समतुल्य खड़ा करके ख्याति पा रहे है। इसी धुनिवाले दरबार के एक संत बाबा शिवानंद जी है वे इसके उलट निराहार पर विश्वास नहीं रखते इसलिए दुनिया की सभी अनमोल वस्तुए सोना चाँदी , प्रकृति का मनुष्यों से संतुलन बनाए रखने हेतु उत्पन्न किए सभी प्रकार के फल आदि , एक एक सूत जोड़कर बनाए वस्त्र को वे अग्नि को समर्पित करने को अपनी भक्ति मानते है ओर उन्हे लगता है की मैं दुनिया का सबसे बड़ा हवनकुंड बनाकर शहर के हर दुकान-मकान के सोना चाँदी दृव्य- खाद्य, औषधि तमाम वस्तुयों आदि को होम करू ओर विश्व मे सर्वाधिक होम करने वाले की जमात मे अपना नाम रोशन करू भले ही इतनी सामाग्रीयों से हजारो लाखों के पेट तृप्त हो सके, उन्हे औषधि ओर स्वस्थ्य मिल सके, धन से उनकी जरूरते पूरी हो सके, पर संतत्व की इन दो विरोधी साधनाओं के लाखों पृथक पृथक भक्त है ,जो इन संतों की साधनाओं से मिले इनके प्रभाव को भुनाकर खुद राजनीति मे खड़े होना चाहते है?
मध्यप्रदेश की राजनीति में कांग्रेस का शासन रहा हो या भाजपा की सत्ता, एक बात लंबे समय से समान दिखाई देती है—राजनीति और आध्यात्मिक जगत के बीच नजदीकियां। प्रदेश ही नहीं, राष्ट्रीय राजनीति में भी समय-समय पर संतों, बाबाओं और आध्यात्मिक गुरुओं का प्रभाव राजनीतिक गलियारों तक पहुंचता रहा है। बड़े-बड़े राजनेताओं और प्रभावशाली लोगों का संतों के दरबार में पहुंचना और आशीर्वाद लेना भारतीय राजनीतिक-सामाजिक संस्कृति का चर्चित पहलू रहा है।
देश की राजनीति में महर्षि महेश योगी, चंद्रास्वामी, आसाराम, रामदेव जैसे आध्यात्मिक व्यक्तित्वों का अलग-अलग दौर में प्रभाव चर्चा का विषय रहा। मध्यप्रदेश भी इससे अछूता नहीं रहा। प्रदेश में पायलट बाबा, मिर्ची बाबा, कम्प्यूटर बाबा, भय्यूजी महाराज, धुनी वाले दादाजी, रावतपुरा सरकार, पंडोखर सरकार, बालाजी सरकार सहित अनेक संतों और आध्यात्मिक संस्थाओं ने अपने-अपने क्षेत्र में प्रभाव स्थापित किया।
इसी क्रम में नर्मदापुरम की धार्मिक और आध्यात्मिक धरती पर भैय्याजी सरकार से अवधूत संत दादा गुरु और अब महायोगी श्री दादा गुरु भगवान के रूप में संबोधित किए जाने तक की यात्रा भी राजनीतिक और सामाजिक चर्चाओं का विषय बनती जा रही है।
नर्मदापुरम वैसे भी आचार्य, धर्माचार्य, संतों और धार्मिक परंपराओं की नगरी के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। ऐसे में किसी संत का बढ़ता सामाजिक प्रभाव केवल आध्यात्मिक गतिविधियों तक सीमित न रहकर जब राजनीतिक और सत्ता के गलियारों में चर्चा का विषय बनने लगे, तो उसके व्यापक प्रभावों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
संत से भगवान तक—आस्था या नया प्रभाव क्षेत्र?
भारतीय परंपरा में संतों और आध्यात्मिक गुरुओं को श्रद्धा देने की पुरानी परंपरा है। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि जब किसी आध्यात्मिक व्यक्तित्व को स्वयं या उनके अनुयायियों द्वारा भगवान अथवा भगवान के अवतार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो उसके साथ आस्था के साथ-साथ विवाद और सार्वजनिक बहस भी जुड़ जाती है। आचार्य रजनीश से भगवान रजनीश तक की यात्रा हो या अन्य चर्चित आध्यात्मिक व्यक्तित्वों के उदाहरण, समाज में ऐसे बदलावों को लेकर अलग-अलग मत रहे हैं।
नर्मदापुरम में भी आज यही प्रश्न राजनीतिक और सामाजिक चर्चाओं के केंद्र में दिखाई दे रहा है कि किसी संत की बढ़ती लोकप्रियता और राजनीतिक-सामाजिक प्रतिष्ठा का भविष्य में सत्ता के समीकरणों पर कितना प्रभाव पड़ेगा?
राजनीतिक पहुंच और सम्मान का सवाल
यदि किसी व्यक्ति के पास कोई संवैधानिक पद, प्रशासनिक जिम्मेदारी अथवा निर्वाचित जनप्रतिनिधि का दायित्व नहीं है, फिर भी उसे सार्वजनिक जीवन में असाधारण सम्मान और राजनीतिक महत्व मिलने लगे, तो स्वाभाविक रूप से चर्चा होती है कि इसके पीछे केवल आध्यात्मिक आस्था है या इसके व्यापक राजनीतिक-सामाजिक मायने भी हैं।
राज्यसभा में मनोनयन तथा राज्य स्तर पर राजनीतिक सम्मान और राज्यमंत्री पद दिए जाने के उदाहरणों ने भी संतों और सत्ता के बीच संबंधों पर बहस को नई दिशा दी है। ऐसे में नर्मदापुरम में दादा गुरु के बढ़ते प्रभाव को लेकर भी राजनीतिक हलकों में तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।
क्या किसी महत्वपूर्ण पद की तैयारी?
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी सुनाई देने लगी है कि आने वाले समय में दादा गुरु को किसी महत्वपूर्ण दायित्व अथवा पद से जोड़ा जा सकता है। हालांकि इस संबंध में किसी आधिकारिक घोषणा या निर्णय को सामने आए बिना इसे केवल राजनीतिक अटकल ही माना जाना चाहिए।
सवाल यह नहीं है कि कोई संत सत्ता के करीब क्यों है। असली सवाल यह है कि सत्ता संतों के करीब क्यों जा रही है और क्या आध्यात्मिक प्रभाव आने वाले समय में राजनीतिक निर्णयों को भी प्रभावित करेगा?
नर्मदा तट की धार्मिक आस्था, संत परंपरा और राजनीति का यह संगम आने वाले दिनों में किस दिशा में जाता है, यह देखना दिलचस्प होगा। फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि नर्मदापुरम में “संत से सरकार और सरकार से भगवान” तक की बदलती राजनीतिक-सामाजिक भाषा ने नई बहस को जन्म दे दिया है
