सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान के साथ समझौते को समाप्त मानते हुए तेहरान के नेतृत्व पर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि ईरान को किसी भी परिस्थिति में परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जा सकते। हालांकि बाद में उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें व्यापक और लंबे समय तक चलने वाले युद्ध की संभावना कम दिखाई देती है। NATO के संयुक्त घोषणापत्र में भी ईरान से अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर नौवहन की स्वतंत्रता बनाए रखने का आग्रह किया गया और परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने की प्रतिबद्धता दोहराई गई।
शिखर सम्मेलन में रक्षा खर्च बढ़ाने का मुद्दा भी प्रमुख एजेंडा रहा। सदस्य देशों ने अपनी सैन्य तैयारियों को मजबूत करने, आधुनिक हथियार प्रणालियों, हवाई एवं मिसाइल रक्षा, मानव रहित तकनीकों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और खुफिया क्षमताओं के विकास पर निवेश बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की। गठबंधन का उद्देश्य बदलते सुरक्षा वातावरण के अनुरूप अपनी सामूहिक रक्षा क्षमता को और प्रभावी बनाना है। हालांकि उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार सभी सदस्य देश अभी निर्धारित रक्षा व्यय लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाए हैं, लेकिन आने वाले वर्षों में इस दिशा में प्रयास तेज करने का भरोसा जताया गया।
यूक्रेन को लेकर भी NATO ने अपना समर्थन दोहराया। सम्मेलन में सदस्य देशों ने सैन्य उपकरण, प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता जारी रखने की प्रतिबद्धता दोहराते हुए आने वाले वर्षों तक सहयोग बनाए रखने का आश्वासन दिया। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने सम्मेलन के दौरान कई नेताओं से मुलाकात कर अतिरिक्त सहयोग की मांग रखी। अमेरिका ने भी यूक्रेन की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के लिए सहयोग बढ़ाने के संकेत दिए, जिससे संघर्ष के बीच कीव को महत्वपूर्ण समर्थन मिलने की उम्मीद है।
सम्मेलन के दौरान ग्रीनलैंड का मुद्दा भी एक बार फिर चर्चा में रहा। अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस क्षेत्र के सामरिक महत्व पर जोर देते हुए अपने पुराने रुख को दोहराया। दूसरी ओर डेनमार्क ने स्पष्ट किया कि ग्रीनलैंड उसके अधिकार क्षेत्र का हिस्सा है और उसके भविष्य का निर्णय स्थानीय जनता तथा डेनमार्क के संवैधानिक ढांचे के अनुसार ही होगा। यूरोपीय पक्ष ने भी इस विषय पर डेनमार्क के रुख का समर्थन किया।
बैठक के दौरान सहयोगी देशों के बीच रक्षा सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारी पर भी व्यापक विचार-विमर्श हुआ। कुछ मुद्दों पर मतभेद सामने आने के बावजूद सदस्य देशों ने सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने की प्रतिबद्धता दोहराई। विश्लेषकों का मानना है कि इस शिखर सम्मेलन के फैसले आने वाले समय में यूरोप, मध्य पूर्व और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा रणनीतियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकते हैं।
अंकारा शिखर सम्मेलन ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में NATO अपने रक्षा ढांचे को अधिक आधुनिक और सक्षम बनाने के साथ-साथ यूक्रेन जैसे साझेदार देशों के समर्थन तथा क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए संयुक्त प्रयासों को और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
