EMI आय का 35-40% से ज्यादा नहीं होनी चाहिए
विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि किसी भी व्यक्ति की कुल EMI उसकी मासिक आय के 35 से 40 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। यदि EMI इससे ज्यादा हो जाती है, तो रोजमर्रा के खर्च, बचत और आपातकालीन जरूरतों पर सीधा असर पड़ता है। बैंकों द्वारा भी लोन मंजूरी से पहले आवेदक की आय, मौजूदा कर्ज और खर्च का विस्तृत आकलन किया जाता है ताकि डिफॉल्ट का जोखिम कम किया जा सके।
ब्याज दर का सही चुनाव बेहद जरूरी
लोन लेते समय सबसे महत्वपूर्ण पहलू ब्याज दर होता है। ग्राहकों को यह समझना चाहिए कि फ्लोटिंग और फिक्स्ड ब्याज दर में बड़ा अंतर होता है। फ्लोटिंग रेट में बाजार की स्थिति के अनुसार EMI बढ़ या घट सकती है, जिससे भविष्य में भुगतान अनिश्चित हो सकता है। वहीं फिक्स्ड रेट में EMI पूरी अवधि के लिए स्थिर रहती है, जिससे बजट प्लानिंग आसान हो जाती है।
लोन अवधि का सीधा असर EMI पर
लोन की अवधि भी EMI को सीधे प्रभावित करती है। लंबी अवधि चुनने पर EMI कम हो जाती है, जिससे मासिक दबाव कम महसूस होता है, लेकिन कुल मिलाकर ब्याज अधिक देना पड़ता है। वहीं कम अवधि के लोन में EMI ज्यादा होती है, लेकिन कुल ब्याज कम चुकाना पड़ता है। ऐसे में वित्तीय विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि लोन अवधि का चुनाव अपनी आय और खर्च के संतुलन को ध्यान में रखकर करना चाहिए।
क्रेडिट स्कोर और अतिरिक्त चार्ज पर ध्यान जरूरी
लोन लेने से पहले क्रेडिट स्कोर की जांच करना भी जरूरी है, क्योंकि अच्छा क्रेडिट स्कोर होने पर कम ब्याज दर पर लोन मिलने की संभावना बढ़ जाती है। इसके अलावा प्रोसेसिंग फीस, प्रीपेमेंट चार्ज और अन्य छिपे हुए शुल्कों की जानकारी भी पहले से लेना जरूरी है, ताकि बाद में कोई अतिरिक्त आर्थिक बोझ न पड़े।
सही योजना से ही बनती है वित्तीय स्थिरता
विशेषज्ञों का कहना है कि लोन लेना गलत नहीं है, लेकिन बिना योजना के लिया गया कर्ज भविष्य में आर्थिक परेशानी का कारण बन सकता है। सही EMI प्लानिंग और समझदारी से लिया गया निर्णय व्यक्ति को वित्तीय स्थिरता की ओर ले जाता है।
