कांग्रेस विधायक दल की बैठक में जब डीके शिवकुमार को औपचारिक रूप से नेता चुना गया, उसी समय पार्टी के भीतर यह संदेश भी देने की कोशिश हुई कि यह बदलाव किसी एक नेता के पीछे हटने का संकेत नहीं है, बल्कि संगठनात्मक पुनर्संरचना का हिस्सा है। केसी वेणुगोपाल ने इस मौके पर सिद्धारमैया की राजनीतिक भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने पार्टी के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया है और उनके अनुभव का उपयोग आगे भी किया जाएगा। उनके अनुसार, सिद्धारमैया की राजनीतिक समझ और ओबीसी समुदाय में उनकी मजबूत पकड़ कांग्रेस के लिए राष्ट्रीय स्तर पर भी उपयोगी साबित हो सकती है।
सूत्रों के अनुसार, नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा के दौरान कांग्रेस आलाकमान ने सिद्धारमैया को राज्यसभा भेजने और दिल्ली में एक बड़ी जिम्मेदारी देने का प्रस्ताव भी दिया था। यह प्रस्ताव इस दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा था कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी अपने सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने के लिए अनुभवी नेताओं को अग्रिम पंक्ति में बनाए रखना चाहती है। हालांकि 78 वर्षीय सिद्धारमैया ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया और उन्होंने कर्नाटक की राजनीति में ही सक्रिय रहने की इच्छा जताई।
विधायक दल की बैठक में खुद सिद्धारमैया ने डीके शिवकुमार के नाम का प्रस्ताव रखकर नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया को सहज बनाने में अहम भूमिका निभाई। वरिष्ठ नेता जी परमेश्वर ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया, जिसके बाद विधायकों ने सर्वसम्मति से शिवकुमार को नेता चुन लिया। इस फैसले के बाद पार्टी के भीतर एकता का संदेश देने की कोशिश भी स्पष्ट रूप से दिखाई दी।
बाद में सिद्धारमैया ने शिवकुमार को शुभकामनाएं देते हुए भावुक संदेश साझा किया, जिसमें उन्होंने संविधान और देश के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की रक्षा के लिए निरंतर संघर्ष की बात कही। इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन भले ही औपचारिक रूप से पूरा हो गया हो, लेकिन कांग्रेस के भीतर सिद्धारमैया की भूमिका अभी भी महत्वपूर्ण बनी हुई है और पार्टी उन्हें विभिन्न स्तरों पर सक्रिय रखने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है।
