यह मामला उन याचिकाओं से जुड़ा है, जो मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल के शिक्षक संघों द्वारा दायर की गई थीं। इन याचिकाओं में 2025 के उस फैसले की समीक्षा की मांग की गई थी, जिसमें कहा गया था कि कक्षा 1 से 8 तक के सभी सेवारत शिक्षकों को दो साल के भीतर TET पास करना अनिवार्य होगा, अन्यथा उन्हें सेवा से हटाया जा सकता है या अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी जा सकती है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस मनमोहन और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने स्पष्ट किया कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act 2009) का उद्देश्य बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है और इसके लिए योग्य शिक्षकों का होना बेहद जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि जब तक बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं मिलेगी, तब तक उनके समग्र विकास की कल्पना नहीं की जा सकती।
तमिलनाडु सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि इस फैसले से राज्य में लगभग चार लाख शिक्षक प्रभावित हो सकते हैं और कई स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी हो जाएगी। इस पर अदालत ने कहा कि केवल नौकरी बचाने के तर्क से बच्चों के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
जस्टिस दत्ता ने सुनवाई के दौरान कड़ा शब्दों में कहा कि यह सोच सही नहीं है कि कोई सिर्फ अदालत से आदेश लेकर अपनी नौकरी सुरक्षित करना चाहता है, जबकि बच्चों की शिक्षा के बारे में गंभीरता से विचार न किया जाए।
वहीं कुछ याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि लंबे समय से सेवा दे रहे अनुभवी शिक्षकों पर TET लागू करना अनुचित है और इससे लाखों शिक्षकों की नौकरी प्रभावित होगी। इस पर अदालत ने कहा कि शिक्षा की गुणवत्ता सर्वोपरि है और कानून के अनुसार न्यूनतम योग्यता का पालन जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले पर विस्तार से सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब देशभर के लगभग 25 लाख से अधिक शिक्षकों की नजर इस फैसले पर टिकी हुई है, क्योंकि इसका सीधा असर उनकी नौकरी और सेवा शर्तों पर पड़ सकता है।
