चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बैठक के दौरान ताइवान को लेकर स्पष्ट संकेत देते हुए कहा कि यह मुद्दा दोनों देशों के संबंधों में सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि इसे सही तरीके से संभाला नहीं गया, तो इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं, जो द्विपक्षीय संबंधों को भी प्रभावित कर सकते हैं। चीन लंबे समय से ताइवान को अपना हिस्सा मानता रहा है और उसने आवश्यकता पड़ने पर बल प्रयोग की संभावना को भी नकारा नहीं है।
इस बयान के तुरंत बाद ताइवान की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई, जिसने पूरे घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया। ताइवान की प्रशासनिक इकाई के प्रवक्ता ने कहा कि क्षेत्रीय असुरक्षा का वास्तविक कारण चीन की सैन्य गतिविधियां और आक्रामक रवैया है। उनके अनुसार, ताइवान स्ट्रेट और पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अस्थिरता का मूल कारण वही नीतियां हैं, जो लगातार सैन्य दबाव और शक्ति प्रदर्शन को बढ़ावा देती हैं।
ताइवान ने यह भी जोर देकर कहा कि अपनी सुरक्षा को मजबूत करना और प्रभावी रक्षा व्यवस्था विकसित करना ही वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उसका मानना है कि बिना मजबूत रक्षा ढांचे के क्षेत्रीय स्थिरता संभव नहीं है, क्योंकि मौजूदा परिस्थितियों में सैन्य खतरे लगातार बढ़ते जा रहे हैं।
इस बीच, वैश्विक मंच पर अमेरिका की भूमिका भी चर्चा में बनी हुई है। अमेरिका लंबे समय से ताइवान के साथ अनौपचारिक लेकिन मजबूत संबंध बनाए हुए है, हालांकि उसने यह स्पष्ट नहीं किया है कि किसी संभावित संघर्ष की स्थिति में उसकी सैन्य भूमिका क्या होगी। यही अनिश्चितता क्षेत्रीय समीकरणों को और जटिल बनाती है।
बैठक के दौरान अन्य वैश्विक मुद्दों पर भी चर्चा हुई, जिसमें मध्य पूर्व की स्थिति, यूक्रेन संघर्ष और कोरियाई प्रायद्वीप से जुड़े सवाल शामिल थे। लेकिन ताइवान का मुद्दा सबसे अधिक संवेदनशील माना गया, क्योंकि यह सीधे तौर पर अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा से जुड़ा हुआ है।
चीन की ओर से यह भी दोहराया गया कि ताइवान की स्वतंत्रता को स्वीकार नहीं किया जाएगा और इसे लेकर किसी भी तरह की स्थिति क्षेत्रीय शांति के लिए खतरा बन सकती है। वहीं दूसरी ओर, ताइवान का रुख स्पष्ट है कि वह अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था और सुरक्षा नीति पर कोई समझौता नहीं करेगा।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि ताइवान मुद्दा केवल क्षेत्रीय विवाद नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है। आने वाले समय में इस पर होने वाली किसी भी कूटनीतिक हलचल का असर केवल एशिया ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था पर देखने को मिल सकता है।
