जानकारी के अनुसार, अमेरिका ने बांग्लादेश के साथ एक पारस्परिक व्यापार समझौते (ART) पर आगे बढ़ते हुए उसके बंदरगाहों और ढांचे तक पहुंच हासिल की है। इसके बदले में बांग्लादेशी टेक्सटाइल उत्पादों पर अमेरिकी टैरिफ में राहत देने की बात कही गई है। यह समझौता अमेरिकी कंपनियों के लिए बांग्लादेश के ऊर्जा, डिजिटल और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में प्रवेश को भी आसान बनाता है।
इसके साथ ही सुरक्षा सहयोग से जुड़े दो महत्वपूर्ण प्रस्ताव—GSOMIA और ACSA—पर भी चर्चा बढ़ी है। इन समझौतों के तहत दोनों देशों की सेनाओं के बीच खुफिया जानकारी साझा करने और अमेरिकी सैन्य जहाजों व विमानों को बांग्लादेश के बंदरगाहों और एयरबेस का उपयोग करने की अनुमति मिल सकती है। रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ एयरबेस पर अमेरिकी रडार सिस्टम की मौजूदगी भी दर्ज की गई है, जिससे क्षेत्रीय निगरानी क्षमता बढ़ी है।
यह घटनाक्रम चीन की “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” रणनीति के लिए चुनौती माना जा रहा है, जिसके तहत चीन म्यांमार, पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों में बंदरगाहों और रणनीतिक ढांचे का विकास कर रहा है ताकि अपने समुद्री व्यापार मार्ग सुरक्षित रख सके। बांग्लादेश, विशेषकर चटगांव और मातारबारी जैसे बंदरगाह, इस रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, अगर बांग्लादेश में अमेरिकी प्रभाव बढ़ता है तो यह चीन के “चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारे (CMEC)” और क्षेत्रीय सप्लाई चेन पर असर डाल सकता है। वहीं अमेरिका इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति मजबूत कर चीन के प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है।
इसी बीच बांग्लादेश की विदेश नीति भी संतुलन की कोशिश में दिखाई दे रही है, जहां एक ओर वह अमेरिका के साथ सहयोग बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर चीन के साथ व्यापारिक संबंध भी मजबूत बनाए हुए है। दोनों देशों के बीच अरबों डॉलर का व्यापार और सैन्य सहयोग इसे और जटिल बनाता है।
कुल मिलाकर, बांग्लादेश अब केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं बल्कि इंडो-पैसिफिक की एक महत्वपूर्ण जियोपॉलिटिकल धुरी बन चुका है, जहां अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा आने वाले समय में और तेज होने की संभावना है।
