हमारे बुज़ुर्ग एक छोटी-सी बात कह जाते थे—”जितनी चादर हो, उतने ही पैर पसारो।” उस समय यह केवल घर-गृहस्थी की सीख लगती थी, लेकिन आज समझ आता है कि इसमें पूरी अर्थव्यवस्था, पूरा समाज और पूरा जीवन-दर्शन समाया हुआ है।
आज का दौर उल्टा है। चादर छोटी होती जा रही है और पैर नहीं, इच्छाएँ लंबी होती जा रही हैं। जेब में पाँच रुपये हों, लेकिन मोबाइल पचास हजार का चाहिए। घर किराए का हो, पर गाड़ी ऐसी हो कि मोहल्ला देखता रह जाए। बैंक का कर्ज सिर पर हो, लेकिन सोशल मीडिया पर तस्वीर ऐसी कि मानो कुबेर का खजाना विरासत में मिला हो।
अब लोग कमाने से ज़्यादा दिखाने में विश्वास करने लगे हैं। पहले आदमी अपनी औकात देखकर खर्च करता था, आज खर्च देखकर औकात तय की जाती है।
विडंबना देखिए… सुविधाएँ बढ़ीं, लेकिन सुकून घट गया। घर बड़े हो गए, परिवार छोटे हो गए। अलमारियाँ भर गईं, लेकिन मन खाली रह गया। बैंक की ईएमआई, बच्चों की फीस, दिखावे की दौड़ और तुलना की आग ने आदमी को ऐसा दौड़ाया कि वह यह भूल गया कि आखिर दौड़ किसलिए रहा है।
बाज़ार रोज़ कान में फुसफुसाता है—”और खरीदो, और खर्च करो, तभी सफल कहलाओगे।” लेकिन संतों की वाणी आज भी कहती है—”संतोष सबसे बड़ा धन है।” फर्क बस इतना है कि अब हम विज्ञापन जल्दी सुन लेते हैं, उपदेश देर से समझते हैं।
सच तो यह है कि सुख का संबंध चादर की लंबाई से कम और मन की संतुष्टि से अधिक है। जिस दिन मनुष्य ने अपनी इच्छाओं की लगाम अपने हाथ में ले ली, उसी दिन आधा तनाव समाप्त हो जाएगा।
इसलिए अगली बार जब मन तुलना करने लगे, तो अपने बुज़ुर्गों की वह पुरानी सीख याद कर लीजिए—
“जितनी चादर हो, उतने ही पैर पसारो।”
यकीन मानिए, यह केवल कहावत नहीं, बल्कि ऐसा जीवन-मंत्र है जो जेब भी बचाता है, रिश्ते भी बचाता है, स्वास्थ्य भी बचाता है और सबसे बढ़कर—मन की शांति भी बचाए रखता है।
शहरनामा का निष्कर्ष:
आज आदमी चादर बढ़ाने में इतना व्यस्त है कि चैन की नींद ही खो बैठा है। जबकि सुख का राज़ चादर बड़ी करने में नहीं, इच्छाएँ छोटी करने में छिपा है।
शुभ प्रभात
दासानुदास चेदीराज दास
