भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी सादगी और गहराई से भरे गीतों का जिक्र होगा, गीतकार शैलेंद्र का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिया जाएगा। ‘किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार’ जैसे कालजयी गीत लिखने वाले इस कलाकार का जीवन किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं था। पाकिस्तान के रावलपिंडी में जन्मे शंकरदास केसरीलाल, जिन्हें दुनिया ने बाद में शैलेंद्र के नाम से पूजा, के पूर्वज मूलतः बिहार के आरा जिले से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता ब्रिटिश मिलिट्री अस्पताल में ठेकेदार थे, लेकिन पारिवारिक और आर्थिक परिस्थितियों के चलते उन्हें रावलपिंडी छोड़कर मथुरा बसना पड़ा। शैलेंद्र बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे और उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मथुरा के ही एक सरकारी स्कूल से पूरी की। उनकी मेधा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इंटरमीडिएट की परीक्षा में उन्होंने पूरे उत्तर प्रदेश में तीसरा स्थान प्राप्त किया था।
पढ़ाई में अव्वल होने के बावजूद घर की आर्थिक तंगी ने उन्हें अपनी पसंद का रास्ता चुनने की इजाजत नहीं दी। परिवार की जिम्मेदारी कंधे पर आई तो उन्होंने रेलवे की परीक्षा पास की और मुंबई में बतौर मैकेनिक यानी अप्रेंटिस की नौकरी शुरू कर दी। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि जिस शख्स ने शब्दों से संवेदनाओं की दुनिया बुनी, उसके पास मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा था और वेल्डिंग जैसे कठोर काम में उनकी विशेषज्ञता थी। मुंबई के रेलवे यार्ड में पसीने और लोहे की गूँज के बीच शैलेंद्र बेमन से अपना काम करते थे, क्योंकि उनका मन तो कविता और साहित्य की दुनिया में बसता था। इस नौकरी के दौरान ही उनके भीतर का कवि जाग उठा और वे खाली समय में कागज के टुकड़ों पर अपनी भावनाओं को उकेरने लगे।
रेलवे की इस नौकरी के दौरान शैलेंद्र का जीवन काफी संघर्षपूर्ण रहा। आर्थिक तंगी का आलम यह था कि शादी होने के बावजूद वे अपनी पत्नी को मुंबई नहीं ला पा रहे थे। विरह का यही दर्द और अपनों से दूर रहने की तड़प उनके बाद के गीतों में साफ झलकती है। कहा जाता है कि जब वे अपनी कविताओं के जरिए भारतीय जन नाट्य संघ यानी इप्टा से जुड़े, तब उनकी मुलाकात राज कपूर से हुई। राज कपूर उनकी प्रतिभा से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने शैलेंद्र को फिल्मों के लिए लिखने का प्रस्ताव दिया, लेकिन शुरुआत में स्वाभिमानी शैलेंद्र ने इसे ठुकरा दिया था। हालांकि, बाद में अपनी घरेलू जरूरतों और आर्थिक तंगहाली के कारण उन्होंने फिल्मी दुनिया का रुख किया और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
शैलेंद्र और राज कपूर की जोड़ी ने भारतीय सिनेमा को ‘आवारा हूं’, ‘मेरा जूता है जापानी’ और ‘प्यार हुआ इकरार हुआ’ जैसे न भूलने वाले गाने दिए। शैलेंद्र की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे जटिल से जटिल दार्शनिक बातों को बहुत ही सरल शब्दों में पिरो देते थे। उन्होंने जो कुछ भी अपनी निजी जिंदगी में झेला, चाहे वह मैकेनिक की नौकरी की मजबूरी हो या गरीबी का दंश, उसे उन्होंने अपनी रचनाओं में ईमानदारी से उतारा। उनके गीतों में आम आदमी का दर्द और उसकी छोटी-छोटी खुशियां साफ दिखाई देती थीं। यही वजह है कि उनके लिखे गीत आज भी उतने ही प्रासंगिक और ताजे महसूस होते हैं जितने दशकों पहले थे।
मात्र 43 साल की छोटी सी उम्र में शैलेंद्र इस दुनिया को अलविदा कह गए। यह एक अजीब संयोग था कि जिस 14 दिसंबर को उनके सबसे अजीज दोस्त राज कपूर का जन्मदिन होता था, उसी दिन हिंदी सिनेमा के इस चमकते सितारे का निधन हुआ। उनके जाने से जो खालीपन पैदा हुआ, उसे आज तक कोई भर नहीं पाया है। एक मैकेनिक के रूप में करियर शुरू करने वाले इस इंसान ने साबित कर दिया कि अगर दिल में जज्बा हो और कलम में सच्चाई, तो लोहे के कारखानों में काम करते हुए भी दुनिया को प्रेम और भाईचारे का संगीत सुनाया जा सकता है। आज भी जब कोई ‘सजन रे झूठ मत बोलो’ या ‘सब कुछ सीखा हमने’ सुनता है, तो उसे उस महान आत्मा की याद आती है जिसने अपनी पूरी जिंदगी शब्दों की साधना में लगा दी।
