आत्माराम यादव पीव चीफ एडिटर हिन्द संतरी
यह सृष्टि बड़ी ही अद्भुत ओर अलोकिक है जिसमें जो जन्मता है वह मरता है। जन्म की इस नैसर्गिक प्रक्रिया में नारी जननी ओर नर जन्मदाता की भूमिका में होते है। इस प्रकृति में यह आवश्यक नही की जन्मदात्री नारी/ स्त्री ही हो, नारी रूप में सृष्टि का पालन पोषण ओर संहार में धरती भी जननी है, प्रकृति भी जननी है, नदिया भी जननी है जीवजन्तु, प्राणी, वनस्पति, पेड़ पौधे ओर लताबेला सभी जननी के रूप में है जो नित नूतन सृष्टि को जन्म देकर जगत को उपहार देते आ रहे है। जिस जाति प्रजाति में नरनारी के संसर्ग से जन्म हो वह उतनी ही अपनी जननी –जन्मदाता से संबन्धित ओर सीमाओं में विध्य होती है। पेड़ पोधे जन्म के बाद पतझड़ में अपने पत्तों का परित्याग कर बसंत में फिर हरे भरे तरोताजा हो जाते है। जीवजन्तु, वन्य प्राणी ओर जल के जीवों का भी प्रजनन काल सुनिश्चित है, जिसमें जन्म प्रक्रियाए सुचारु रूप से सदियों से चलती आ रही है।
जन्म की प्रक्रिया में कुछ भिन्नताए भी है जहां नर पौधे भी फल को जन्म देकर आहार की व्यवस्था संचालन में सम्मिलित है वही यह सारा जगत इन नर पेड़-पौधो से पैदा फलों के स्वादों के लिए लालायित होता है। परमात्मा की इस सृष्टि में नारी अकेली जननी नहीं फल बीज के रूप में नररूपी वृक्ष भी जननी के रूप में पैदावार करते है किन्तु हम उन्हे नर से पैदा होने से तिरष्कार नहीं करते बल्कि जीवन की आवश्यकता का अंग समझ स्वीकारते है। इन नर पेड़-पौधों की जड़ें भूमि में होने से उनको जननी का श्रेय नहीं मिल पाता है किन्तु वे जननी के रूप में तो है ही । इन नर पेड़ों की ही भांति हमे अनाज देने वाले नर बीज है जो हमारा नित्य का आहार है जिसमें अनाज रूप में गेहूं, चना, धान/चावल, कोदो आदि नर रूप की फसलें है वही फलों में प्रमुखरूप से देखा जाये तो- अंगूर, अन्ननास, अंजीर, आलूबुखारा, आम, अमरूद, करोंदा, केला, खरबूजा, नीबू, संतरा, पपीता, सेब, नारियल जामुन, चीकू, खजूर आदि नर वृक्ष है, जिन्हें हम नारी नहीं मानते है। कुछ पेड़ नारी के नाम की पहचान लिए नारीरूपा स्वीकार्य होकर फल देते है जिसमें इमली, मोसम्मी,लीची, खुबानी ओर सीताफल प्रमुख है, इस वृक्षों के रजस्वला होने के संबंध में मान्यता है की ये जब भी रजस्वला होते है तब उनसे गोंद/गाद की अतिरिक्त पैदावार होती है जो अधिकांश औषधि के रूप में प्रयोग की जाती है।
धरती पर जन्म की इस प्रक्रिया में पेड़ पौधे, फसले, फल, बीज आदि मनुष्य जाति ओर जीवजंतुओं ओर प्राणियों के पालनार्थ भोजन एवं ओषधिरूप में प्राप्त होता है। वनों से पैदा हुई लकड़ी, पहाड़ों ओर नदियों से पैदा हुये पत्थर, रेत गिट्टी आदि खनिज संसाधन का उपयोग नगरों – गांवों सहित धरा के किसी भी स्थान पर उच्च इमारतें- कल कारखाने आवासीय भवनो आदि के लिए किया जाता है। हर साल इन जीवजंतुओं प्राणियों, मनुष्यों के साथ यह प्रकृति ओर सभी नदियां भी गर्भ धारण करती है, अर्थात नदियां भी पेट से होती है ओर रेत, कंकड़ पत्थर सहित अन्य उत्पाद वरदान में देती है।
धरती माँ नारी रूप में देवताओं द्वारा संबोधित है, यह भूदेवी धरती माँ भी साल में तीन दिन के लिए रजस्वला होती हैं जिस की पौराणिक मान्यता है और भगवान विष्णु की पत्नी के नाम पर ओडिशा के लोग आषाढ़ मास के तीन दिन इनके रजस्वला मानते है। इन तीन दिनों के लिए राज्य में कृषि संबंधी सभी कार्यों को रोककर इस समय को “रज” या “रजो” त्यौहार के तौर पर बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस दौरान धरती मां का प्रतीक मानकर सिल बट्टे की पूजा होती है और मिट्टी से जुड़े कार्य नहीं किये जाते। इस दिन भगवान सूर्य देव वृषभ राशि से मिथुन राशि में संचरण करते हैं जिस का विभिन्न राशियों पर भी असर होता है। मान्यता है रज संक्रांति के बाद ही बारिश की ऋतु की साल में एक बार धरती माता भी रजस्वला होती है। इसी तरह नदी ओर नदों का जिक्र है ओर कल्हण की राजतरंगिणी में नदियों के रजस्वला होने का उल्लेख है जब सूर्य देवता कर्क और सिंह राशि पर होते हैं तब नदियाँ रजस्वला होती हैं।यह मूल वचन महर्षि अत्रि का है –सिंह कर्कट योर मध्ये सर्वा नद्यो रजस्वला ।तासु स्नानं न कुर्वीत वर्जयित्वा समुद्रगा: ।। भारत में ग्यारह नदियों को पवित्र माना गया है। ये हैं– गंगा, महानदी , तापी , कृष्णा, वेणी , गोदावरी , तुंगभद्रा,ताम्रपर्णी , कावेरी ,रेवा (नर्मदा) और गोमती जिसे लेकर महर्षि देवल इन्हे रजस्वला होने के बाद भी पवित्र मानते है।
देश में प्रवाहित सारी नदियां कई युगों से बहती आ रही है। हमने नदियों को देवी माँ के स्थान पर रखा है ओर हमे जन्म देने वाले माता-पिताओं को वृद्धाश्रम में रखवा दिये। हम 16 साल में जवान होते है किन्तु नदिया कालजयी है वे समय की सीमाओं से बंधी नहीं होने से हमेशा तरोताजा जवान रहती है। हमारा पूरा जीवन 60 से 100 साल में पूरा हो जाता है ओर मरने के बाद दाहसंस्कार के बाद किसी नदी घाट से समेटी दो मुट्ठी राख़ में कैद हो जाता है। कई सदियां बीत गई कई युग बीत गए, हजारों पीढ़िया निकल गई जो नदी जहां बह रही थी वह वही पर बह रही है ओर पूरे वेग से बहते हुये आज भी जवान है जिसका सामना न तो कभी कोई देवता कर सके थे ओर न ही आज किसी के द्वारा करने का प्रश्न पैदा होता है। हाँ धरती पर आई प्रलय, भूकंप आदि बड़े उत्पादों के कारण सेकड़ों नदी ताल अपना अस्तित्व खो चुके है किन्तु गंगा, यमुना, सरस्वती, काबेरी, गोदावरी, नर्मदा, सरयू, ताप्ती आदि युगों से अपने स्थान पर लाखों सालों से अटल है।
लाख साल की उम्र के मामले में कहा जाता है की ब्रम्हा का एक दिन व्यतीत होता है तब धरती पर एक युग बदल जाता है यानि हजारों साल निकल जाते है, उस मायने से ये नदिया चिरयुवा ही तो है ओर जब भी ये युवा नदिया अपने प्रबलवेग में आ जाये पलक झपकते ही इंसान की सृष्टि को घास के तिनके की तरह बहा ले जाये। बाबजूद ये नदिया अपने तटीय आवादी को पालन पोषण कर उनकी सुख समृद्धि को उपहार में देती आई है। ये नदिया माँ कही जाती है ओर माँ का यानि नारी का धर्म को निभाती है ओर हर बरसात में जब साधु सन्यासी चातुर्मास करते है तब ये राजस्वला होती है ओर प्रकृति के गर्भ को अपनी कोख में सँजोये इंसान को लौटा देती है, यानि ये सारी नदिया रेत, कंकड़ पत्थर को जन्म देती है। नर्मदापुरम जिला हो या नर्मदा, गंगा के कोई भी तटीय किनारे हो वहाँ पर नदिया रेत का पहाड़ खड़ा कर देती है जिसकी सरेआम लूट को लेकर यह बात सच सावित होती है – नर्मदा उगले सोना बंफर, बम्हन ठकुरा सबई मिल, भर लेऊ अपने डंफर।
नर्मदा की सहायक -नदिया बियानी अकरा ककरा, नर्मदा बियानी रेत। बूढ़ी बियानी दुई -दुई लोमरी तपोलट बालक, पेट ।। गाय, भैंस या बकरी जब दो दो बच्चे जनती है तब उसके पालने वाले को मिलने वाले सुख को बयान नही किया जा सकता, कारण उसे इन दो बच्चों के पैदा होने से धन वृद्धि का लाभ जो होता है। यहाँ तो नदी अपने दोनों किनारों को रेत, कंकड़ पत्थर से जो मालामाल कर इसे लूटने वालों के गालों पर लालिमा जो ला देती है। रेत के खेतों के अम्बार लगाकर नर्मदा की कोख मे जेसीबी, पोकलेन मशीन से रेत को कुरेदकुरेद कर आन बान ऑर शान से जनता के बीच में खड़े होकर ये राजनेता खुद को नर्मदा का बेटा कहते है ऑर नर्मदा को लहूलुहान कर डंफ़रो की लाइन लगाकर अपनी हवस को पूरा करने के लिए जहा मौका मिल जाये वही पर हाथ मारने से बाज नहीं आते, सरकार इनकी है ऑर अधिकारी इनके गुलाम, गुलाम अधिकारी इनकी निष्ठा की जंजीरों से बंधे है, देश में माइनिंग विभाग सिर्फ नेताओं के सेवा करने के लिए है, ये करमजले संवधान की शपथ लेकर भी कभी अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वहन करते तो आज देश में इतने बिगड़े हालात नही होते-
साँची कहो, सांची कहो,
सांची कहो, ए हो सरकारवा,
क्या चौगुनी नर्मदा तूने देखि।
दिव्यता जाकी बड़ी निराली,
अंबार रेत के न होवे खाली,
लगे रहो दिन रात,
नर्मदा करती इनके कर्मों की लेखि ॥ यहाँ
रेत चोरी कारोबार में लगे लोग नर्मदा मैया पर प्रसादी-भंडारा ही इसलिए कराते है ओर कहते है नर्मदा मैया तू सच में तो मेरी मैया नहीं है किन्तु धर्म से तू मैया है । मेरी मैया ने तो जन्म देके छोड़ गई है वो तो किस्मत से नर्मदा मैया तू अच्छी मिल गई जो हर साल हमें रेत से मालामाल कर रही है। तूने इनती रेत,कंकर पत्थर दिये की हमे मिले सुख की सौगात का वर्णन नहीं कर सकता हूँ। सच मे तूने तो हमे निहाल कर दिया ओर हमारी पीढ़िया तेरे गुण गाएगी, हमारी दुनिया ही तू है जन्म के बाद भले धर्म ओर जाति कोई हो पर तू तो जीवन भर कर्म की भी मैया हो गई जो तेरे आँचल से रेत कंकड़ पत्थरा बिना मूल्य चुकाए उठा रहा हूँ ओर इससे जहां सुख की सौगात तो मिली वही मेरी मुराद पूरी हो गई।
यह लिखते समय एक मित्र मेरा मज़ाक उड़ाकर बोला, अगर नदी गर्भवती होती है तो उसका पेट किसी को दिखाई क्यों नहीं देता है? आखिर प्रश्न का जबाव भी तो मिलना चाहिए। नदिया वर्षाकाल में पेट से हो जाती है ओर इसी वर्षाकाल में नदिया मुख्यधारा को छोड़ विकराल रूप में अपनी सीमाए त्यागकर गांवों शहरों ओर घरों में प्रवेश कर जाये ओर वर्षा समाप्ति पर अपने मूलस्वरूप में आ जाये तब उसके किनारों पर लगे रेत के टापुओं से पता चलता है की नदी भी पेट से थी ओर बियाने के बाद ये रेत कंकड़ आदि के अंबार लगा रखे है, जो क्रम सदियों से चला आ रहा है ओर हम उन अंबारों को अपनी जरूरत से ज्यादा उठाने को तत्पर हो गए है।
हमारे बीच बहने वाली नदी हमे बहुत प्रिय लगती है इसलिए नदी भी अपने स्वभाव को मानवीय बनाकर माँ के रूप में हमारे सुख दुख दूर करने लग जाती है और हमारे आंसू पोंछ कर हमे जो सहानुभूति देती है वह किसी मित्र रिश्तेदार के करीब आने पर नहीं मिलता है। आप कितने भी दुखी हो, कष्ट में हो, जीवन के सारे मार्ग बंद हो गए हो और मृत्यु को गले लगाना चाहते हो। माँ रूपी नदी के तट पर बैठ जाइए सब कष्ट दूर हो जाते है ओर सूनी गोद वाली बहू बेटियाँ अपनी गोद में लल्ला खिलाती है, यह माँ का स्वभाव जहां सबकी मानसिक व्यथा दूर हो जाती है जैसे गंदले पानी से कचरा अंदर बैठने के साथ ही नदी का जल उजला और साफ स्वच्छ हो जाता है। अब नदी को देखिये वे आपके लिए अपने कर्तव्य पालन करते कभी थकती नहीं ओर अपनी सतत यात्रा जारी रखती है। बरसात में ये सारी नदिया गर्भ धारण कर अपने तटों पर जनती है यानि प्रकृति के खजाना को जन्म देकर चारों ओर रेत, कंकड़ पत्थर का अम्बार लगा देती है। नदी के जन्म दिये रेत आदि को हम लूटने लग जाते है ओर नदी की कोख में आधुनिक मशीनों से दोहन जारी कर नदी का दिल छलनी कर देते है। अगर नदी हर साल बियाती है ओर अपनी कोख में असहता का आभास किए बिना अपने तटों को सम्पन्न कर प्रकृति की शोभा बढ़ाती है तो वह हमारे उल्लास के लिए होता है न की नदी की गोद उजाड़ने के लिए ही यह सब वह जनती है।
