अथ श्री अफसर चरित्रम् प्रपंच कथा !
आज देश-प्रदेश में जो भी अफसर है मैं उन अफसरों के चरित्र कथा का वर्णन करता हूँ आप सभी कान में तेल डालकर सुनिए ओर अपना जीवन सार्थक कीजिये। अफसर ओर अवसर भले दो अलग शब्द लगते है पर अफसर को पूरे समय अवसरों की सौगात पर सौगात प्राप्त होती है जो उनके लिए किसी स्वर्गिक आनंद से कम नहीं है। अफसर के पास आए अवसरों को भुनाने वाले इंजीनियर-ठेकेदार स्वामीभक्त नेता आदि होते है जो हमेशा अफसर से अवसर प्राप्त करने में सफल होते है। जो अफसर को समझ लेते है वे अफसरमय हो जाते अर्थात खुद ही अफसर हो जाते है। सोसलमीडिया के इस युग में इस प्रकार के अफसर हो जाने वाले लोगों की अपार भीड़ है जो असली अफसरों की गुण शक्तियों का प्रयोग कर अनेक लोगों के बैंकखातों को खाली कर चुके है ओर करते जा रहे है। वैसे कोई बिरला ही होगा जो अफसर को नहीं पहचानता हो फिर भी आप सभी के संज्ञान में लाना चाहूँगा की आखिर अफसर कौन है, कैसे होते हो, क्या करते है ओर अफसर को बस में करना हो तो बस उनकी पत्नी को बहन बना लो, आप इस उपाय से प्रयागराज स्नान का पुण्य के साथ प्रसाद भी पा जायोगे।
भारत सरकार हो या राज्य सरकार, उनके सभी के सचिवालय,मंत्रालय,सहित सभी उपक्रमों,आयोगों,अभिकरणों, निगम-मंडलों आदि-आदि विभागों में मुख्यसचिव, अपरमुख्यसचिव, प्रमुख सचिव,सचिव,प्रमुख सचिव,अपर सचिव केडर आईएएस,आईपीएस,आईएफएस आदि सरकार की नीतियों-कार्यक्रमों, योजनाओ आदि के प्रमुख है जो प्रदेशों के संभाग में कमिश्नर, जिलों में कलेक्टर, विभागों में विभागप्रमुख होने से भिन्न पद के नाम से भिज्ञ है। पद जो भी हो इन विभाग प्रमुखो को जनता द्वारा आमबोलचाल की भाषा में साहब कहा जाता है ओर समझदार- पढ़ेलिखे लोग सम्मान से उन्हे अफसर मानते है। यानि साहब ओर अफसर दो नही एक हुये जो सरकार और सत्ताधारी सरकार के शासन-प्रशासन के प्रमुख अंग है। अफसर को कोई कोई अधिकारी भी कहता है,आखिर क्यों न कहे? वे अपने- अपने आफ़िसों के संप्रभुत्व प्रवित्तिज्ञ अधिकारी है जिन्हे सरकार का सालाना बजट मिलता है, वे उस संपत्ति के एकाधिकारी रक्षक,सुरक्षक ओर खर्चक जो ठहरे। आजादी के बाद साहब, जो बड़े बाबू माने जाते थे उर्दू अलफ़ास में लोग इन ओहदेदारों को कलेक्टर या डीएम साहब कहने लगे।
कलेक्टर/डीएम जो असल में बड़े बाबू ही है, उन्हे बड़े बाबू कहने ओर सुनने में उन्हे अपना घोर अपमान महसूस होता किन्तु जो अपढ़ बुजुर्ग व्यक्ति उन्हे बड़े बाबू कहकर आनद ओर सुख महसूस कर करता उसे तो बड़े बाबू कहने में गर्व होता ,पर सुनने वाले कलेक्टर को बड़े बाबू शब्द में हीनता का भाव दिखता? इसलिए कोई कलेक्टर इन जैसे लोगों के बड़े साहब या बड़े बाबू सुनने से परहेज कर दूर रखने में अब तक सफल रहे है। बाबजूद आज भी कोई बड़े साहब, कोई प्रधान, कोई हाकिम तो कोई अधिकारी कहने से बाज नहीं आते है। प्रदेश, संभाग ओर जिलों में ये सभी कार्यक्षेत्र के हिसाब से अपने-अपने ओहदेदारी से पहचाने गए ओर जनता अफसरशाही के हवाले कर दी गई ओर अफसर सरकारी आदेशों-कानून के लिए नहीं बल्कि नेताओं के कदमो में नतमस्तक है। आज देश में प्रदेश में, जिलों में तहसील –ग्राम पंचायतों में अफ़सराना राज्य कायम है इसलिए आप जहा देखोगे वहीं अफसरों को पायोगे। सभी जगह आफिसर ही आफिसर है, पत्रकार होने के नाते मेरा दफ्तरों ओर आफिसरों से रोज सामना करना पड़ता है।
अफसर से मुलाकात करना “आ बैल मुझे मार” कहने जैसा होता है। फिर भी विधाता ने अफसर को अपने घर में भीगी बिल्ली बनाया है जो अपनी पत्नी से डरता है, अगर आपको अफसर से अवसर ही अवसर लेना है तो आप उसकी पत्नी को अपनी बहिन बनाकर नाता जोड़ ले, फिर अफसर ओर अवसर आपके हाथों में होंगे। अफसर कि पत्नी यानि आपकी मुहबोली बहिन द्वारा दिलाया गया हर अवसर फिर आपके लिए किसी लाटरी से कम नहीं होगा।अफसर कि पत्नी फिर कह दे तो अफसर कि तो बात छोड़िए अफसर का बाप भी आपके काम को नही रोक सकेगा। इसीलिए आजकल राजनीति ओर अफसरशाही में जब भी किसी को कोई अवसर मिलता है तो वह इस अवसर को भुना लेता है। अनेक जिलों में जहां अफसर कलेक्टर रहे है उनकी पत्नियों से राजनेताओं के यही मधुर संबंध के कारण छोटे घाँस कि भूमि सहित अन्य बेशकीमती करोड़ों की भूमियों पर इन तथाकथित अफसररूपी कलेक्टरों के साले श्सुरों के नाम कर दी गई ओर कई जगह इनकी पत्नियों के नाम से कई जिलों में रिसोर्ट ओर खेती कि भूमि है। बड़े अफसर दलितो शोषितों पीड़ितों आदि आदि के उत्थान की योजनाओं के बजट स्वीकृत कर अपने अधीनस्थ अफसर को भेजता है तो छोटे अफसर के लिए यह सुनहरा अवसर होता है। मजा तो तब है जब कोई खुफिया सूचना या रिपोर्ट के बाद अफसर के इस अवसर को सार्वजनिक कर उसके व्यक्तित्व पर कालिख पोती जाये या काजल की कोठरी में खुद काले हाथ कर अफसर को बचने का अवसर दिया जाये यह पत्रकारिता से भी संभव है ओर अफसरशाही से भी संभव है, यह दोनों ओर से किया जा रहा है ओर अब अफसर ही नहीं अपितु सरकार भी इस युक्ति का प्रयोग कर अवसरों को भुनाकर जनता का भरोसा खो चुकी है। आप किसी भी दपतर में चले जाइए आपका सामना इस बहुआयामी व्यक्तित्व से अवश्य पड़ेगा । यह व्यक्तित्व कोई छोटा मोटा आकार का नहीं अपितु यह विलक्षण प्रतिभा का स्वामी है जो जिस ऑफिस/विभाग में प्रमुख पद पर पदस्थ है उसका सर्वेसर्वा अधिकारों है।
अफसर जिस विभाग या ऑफिस का होता है उसमें उसका एयरकंडीशन कमरा होता है जिसमें आरामदेह कुर्सी पर वह विराजता है ओर उनकी आधुनिक फाइलों से लदी सबसे बड़ी टेबिल के सामने कुछ कुर्सियाँ की विशेष व्यवस्था मीटिंग, सीटिंग ओर आने वालों के बैठने के लिए होती है। अफसर कोई भी हो अपने को सख्त साबित करने के लिए अकड़ा हुआ होता है जिसे अपने दफ्तर में आने के बाद दफ्तर में पदस्थ सभी अधिकारी-कर्मचारी उनकी ड्यूटियाँ आदि के साथ घटित घटनाओं ओर घटना को जन्म देने वाले अपने मातहमों का पूरा काला चिट्ठा पता होता है। वह ऑफिस में घटने वाले आगामी प्रत्येक घटनाओं का ज्ञान रखकरकाम करता है ओर अपने अधीनस्थों से काम कराता है ,कोई भी अफसर की कही बात का विरोध नहीं करता ओर न ही बहस करता है , वरना असफर नाराज हो जाये तो जब तक वह पदस्थ है हर अवसर से हाथ हो धो बैठेगा वही लूप लाइन में मक्खी मरने को विवश होगा
जरूरी नहीं आपका अफसर सलमान खान, शाहरुख खान या अक्षयकुमार जैसा स्मार्ट हो, उसका थोवड़ा कैसा भी अनगढ़ क्यों न हो ,वह अपनी ओर से हमेशा बना ठना दिखेगा, भले बनने ठनने के बाद वह कार्टून नजर आए ,पर वह अफसर है सूटेड-बूटेड है उसकी कही बात का असर जल्दी होता है ओर उसे किसी को भी डाटने- डपटने की सुविधा मिली हुई है। इस बात का एहसास ऑफिस में सभी को सदा बना रहता है ओर उसके दफ्तर में मौजूदगी पर कोई भी मुस्कुराने से भय खाने लगते है ओर अगर उनका मन खुलकर हसने को हो पर वे ओंठो को सीलकर खामोश ओर सतर्क रहने के विवश होंगे की कही यह डाट डपट न लगा दे। सभी मातहत अफसर की जी हजूरी में होते है। वैसे तो कोई भी अफसर किसी भी प्रकार की गलती नही करता है,जो भी गलतियों होती है उनके अधीनस्थों से होती है ओर दफ्तर के जितने भी अच्छे काम होते है वे भले विभाग के लोग रात दिन मेहनत करके अंजाम दे पर उन अच्छे कामों का सेहरा अफसर के सिर पर बंधता है।
अफसर है तो उनके चारों ओर चापलूस होंगे ही, चापलूस वे ही होते है जो जाहिल से जाहिल हो ओर अब्बल दर्जे के कामचोर व लापरवाह हो जिन्हे अफसरों का विशेष कृपापात्र माना जाता है, जो सभी प्रकार के अनैतिक खर्चों के बिलों को ,फर्जी कामों को जो या तो हुये ही नहीं यदि हुये है तो आधे अधूरे है उस सबके बिलों की राशि सहित अन्य सभी जानकारी होती है जहां से पैसा निकालकर अफसर, नेता, विधायक मंत्री आदि सभी के मंसूबे पूरे किए जा सके। अफसर इन्हे ही सारे अवसर देता है अगर भूल से कोई मुहफट अधिकारी या कर्मचारी इनके करीब जाने की सोचे तो ये उन्हे अपने पास फटकने भी नहीं देते है भले वे कितने भी कार्यकुशल हो, समय के पाबंद हो, अफसर की नजरों में वे खटकते है। कोई भी अफसर किसी भी काम को तत्काल या समय से पूर्व करने देना नहीं चाहते है, जितना लोग काम को लेकर परेशान हो अफसर से मिन्नते करे, उनके चक्कर काटे उतना ही अफसर को अच्छा लगता है, यह उसे अपने मान सम्मानजंक लगता है। विभाग कोई भी अफसर कोई भी हो अगर किसी कागज पर उन्हे चिढ़िया बिठानी हो तो अफसर जिसका काम है, जिसका कागज है वह उसके पास जब तक मिन्नतें करके थक न जाये या चिढ़िया बिठाने की सेवा न कर दे,अफसर किसी की सुनेगा भी नहीं, अगर किसी प्रतिष्ठित समाजसेवी से या नेता विधायक,पत्रकार या अन्य से जिसे आप पावरफूल मानते हो से सिफ़ारिश करने पर अफसर सुन ले तो सुनने के बाद अमल नहीं करेगा, क्योकि वह किसी से आदेश लेता नहीं बल्कि आदेश देने वाला होता है।
देश-प्रदेश संभाग-जिलों में मुख्यसचिव से लेकर कलेक्टर तक ओर कलेक्टर से लेकर ग्राम पंचायत के बाबू तक जितने भी अफसर है वे अपने अफसर होने का अहंकार लेकर चलते है, आखिर क्यो न चले हमे आजादी मिली हुई है इसलिए हर अफसर अपने को स्मार्ट समझता है। स्मार्ट समझना ओर दिखना देश के हर अफसर का जन्मसिद्ध अधिकार है ओर कोई भी अफसर के सामने स्मार्ट बने या स्मार्ट दिखाई दे तो वह उसे कैसे सहन कर लेगा? यही कारण है कि कोई भी अफसर “न” सुनना पसंद नही करता, बस उसके अधीनस्थ को चाहिए की वह अपने साहिब द्वारा जो भी कहा जा रहा है बिना कोई सोच विचार कर हा कर दे, ओर अफसर से किसी प्रकार कि प्रतियोगिता न करे। अफसरों को जब भी जहां भी जिस जिले में जिस विभाग में अफ़सरी करने का अवसर मिलता है तो वे सबई भूमि गोपाल की की युक्ति को चरितार्थ करते हुये अपने घरपरिवार के नाम से बेशुमार संपत्ति अर्जित कर अफ़सरी झाड़ने से बाज नहीं आते हे, ये तो सरकार ही अफसरों की, सरकार ओर अफसर दोनों मिलकर हर एक अवसर को भुनाकर अपनी आने वाली पीढ़ी का इंतजाम कर चुके है, कर रहे है, आपका क्या है आप तब भी अवसर की तलाश में थे आगे भी अवसर की तलाश में मर जायोगे ओर अफसर है की आपको जीते जी न कोई अवसर देंगे ओर न ही देने देंगे।
आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
श्री जगन्नाथ धाम काली मंदिर के पीछे,ग्वालटोली
नर्मदापुरम मोबाइल 9993376616

