धार्मिक मान्यताओं के अनुसार निर्जला एकादशी वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण एकादशियों में से एक मानी जाती है। कहा जाता है कि इस व्रत का पालन करने से पूरे वर्ष की एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। इसी विश्वास के चलते प्रदेश के विभिन्न जिलों से श्रद्धालु ग्यारस माता के दर्शन के लिए यहां पहुंचे। मंदिर में महिलाओं ने फल, नारियल, जल से भरे मिट्टी के कलश, छाते और अन्य पूजन सामग्री अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि तथा शांति की कामना की।
मंदिर प्रशासन के अनुसार यह स्थल क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक धरोहरों में शामिल है और इसकी विशेष पहचान ग्यारस माता के एकमात्र प्रमुख मंदिर के रूप में है। निर्जला एकादशी के अवसर पर यहां हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस बार भी जयपुर, अजमेर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर, किशनगढ़, बारां और अन्य क्षेत्रों से आए भक्तों ने माता के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
मंदिर परिसर में विशेष धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया गया। कलश स्थापना, भजन-कीर्तन, कथा श्रवण और दान-पुण्य की गतिविधियां पूरे दिन जारी रहीं। श्रद्धालुओं के लिए ठंडाई और शीतल पेय पदार्थों का वितरण किया गया, जबकि जरूरतमंदों को विभिन्न उपयोगी वस्तुओं का दान भी किया गया। धार्मिक परंपरा के अनुसार निर्जला एकादशी पर जलदान और सेवा कार्यों को अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है।
मंदिर की एक विशेष पहचान यहां स्थित प्राचीन अग्निकुंड भी है, जहां अखंड ज्योति निरंतर प्रज्ज्वलित रहती है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस अग्निकुंड की परिक्रमा करने से श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इसी विश्वास के साथ बड़ी संख्या में महिलाएं दिनभर परिक्रमा करती हुई दिखाई दीं। मंदिर परिसर में भक्ति और श्रद्धा का वातावरण पूरे दिन बना रहा।
श्रद्धालुओं का कहना है कि निर्जला एकादशी केवल व्रत और पूजा का पर्व नहीं, बल्कि आत्मसंयम, सेवा और आध्यात्मिक साधना का भी प्रतीक है। महिलाएं दिनभर निर्जल रहकर माता की आराधना करती हैं और धार्मिक कथाओं का श्रवण करती हैं। उनका विश्वास है कि इस व्रत के प्रभाव से परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।
धार्मिक ग्रंथों में निर्जला एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि महाभारत काल में भीमसेन सभी एकादशी व्रतों का पालन नहीं कर पाते थे। तब उन्हें केवल ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी का व्रत रखने की सलाह दी गई थी। इसी कारण इसे भीमसेनी एकादशी और पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
गर्मी के मौसम में आयोजित होने वाले इस पर्व पर जलदान, छाता, मटका, पंखा और शीतल पेय पदार्थों का दान विशेष महत्व रखता है। श्रद्धालु इसे सेवा और परोपकार का अवसर मानते हैं। भीलवाड़ा का ग्यारस माता मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र बना हुआ है, बल्कि यह राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं का भी जीवंत प्रतीक माना जाता है, जहां हर वर्ष निर्जला एकादशी पर हजारों श्रद्धालु अपनी श्रद्धा अर्पित करने पहुंचते हैं।
