आत्माराम यादव पीव चीफ एडिटर
पुलिस हमारी रक्षक है ओर पुलिस के कारण ही सभी ओर अमन-चैन ओर शांति बनी रहती है। हरेक नागरिक देश के संविधान का पालन करते हुये आजादी से जिये इसके लिए सरकार ने सभी ओर पुलिस थाने खोल रखे है ओर पुलिस कानून ओर सुरक्षा की ज़िम्मेदारी का पालन करती ओर करवाती है लेकिन फिर भी जाने क्यों लोगों का पुलिस से विश्वास उठ गया है। लोग पुलिस को अच्छी नजर से नहीं देखते है ओर भद्दे शब्दों में निंदा करते है। आखिर क्यों काव्यमंचों के संचालक हो या काव्य पाठ करने आए कवि वे खुलेआम पुलिस को चोर,उचक्का, डाकू लुटेरा सहित न जाने क्या क्या उदाहरणों से शर्मनाक तरीके से निंदा कर जनता से वाहवाही लूटकर खुश होते है ओर पुलिस का सार्वजनिक मज़ाक तालियों की गड़गड़ाहट मे सिवाय पुलिसवाले के किसी ओर को नहीं चुभता है, क्यों? जबकि देखा जाये तो पुलिस दिन रात चौबीस घंटे, सातों दिन, पूरे महीने तीज त्योहारों, पर्वों-उत्सवों,मेलों, रैलियों-जुलूसों ओर सामाजिक व राजनैतिक आयोजनों मे ड्यूटी देकर आपकी सेवा में, भीड़ में सभा में शांति कायम रखने के लिए सतर्क रहती है ओर किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना से बचाती है, फिर क्या कारण है कि जनता पुलिस से सुविधा- संरक्षण तो चाहती ही पर व्यवहार-आचरण में वह वर्दी के अपमान में जाने अनजाने शामिल रहती है।
साधारण लोग पुलिस के डर से जब तक बहुत ही कष्ट न सह लें तब तक वे छोटी मोटी शिकायतें मुंह पर नहीं लाते । मन की मन ही में रहने देते हैं। किंतु रात में गश्त देने वाले पुलिसकर्मियों की शिकायत जब देखो तभी जिसके देखो उसी के मुंह पर रखी रहती है। इसका क्या कारण है? पुलिस इनमें भेद क्यों करती है तथा पुलिस की नजर में क्या यह आम व्यक्ति देश का नागरिक नहीं है? क्या पुलिसवाले इतना नहीं जानते कि हम सर्वसाधारण में शांति रखने के लिए रक्खे गए हैं न कि सताने कुढ़ाने वा चिढ़ाने के लिए ? यदि यह है तो फिर यह पुलिस वाले क्यों ऐसा बर्ताव करने से नहीं बचे रहते जिसमे खुद की निंदा या अपमान हो?
इस दुनिया में अच्छे और बुरे लोग सभी समुदायों में हुआ करते हैं तथा बहुत ही अच्छे बुरे लोग बहुत थोड़े होते हैं। इस नियम से पुलिस वालों में से भी जो कोई दुष्ट प्रकृति का होकर खुद को बेरहम-मक्कार, हरामी –भ्रष्ट ओर अब्बल दर्जे का बेईमान बना ले ये ही वर्ग कानून को अपनी पॉकेट में रखकर निंदा का पात्र हो जाता है। इनकी ही निंदा इनके ही कर्म विभाग के अन्य ईमानदार-कर्तव्यनिष्ठ पुलिसवालों के मार्ग में बाधक होने के साथ साथ जगहंसाई का कारण बनते है। जब बिना कारण किसी गरीब-आम नागरिक के लिए पुलिसवाले के कानूनी अधिकार जबरिया प्रताड्ना का कारण बने तो इसकी निंदा होनी चाहिए ओर इस प्रकार के आचरण का बहिष्कार किया जाना चाहिए पर यह नही होता है। पुलिस विभाग के साधारण कर्मचारियों में से प्रशंसा तो कदाचित् कभी किसी बिरले ही के मुख से सुनी जाती है जबकि एक दूसरे के प्रति काम को लेकर प्रतिस्पर्धा होने से वे एक दूसरे की बुराई करने ओर सुनने के अतिरिक्त मीडिया से संपर्क का उसे जगजाहिर कर सुनने-सुनाने ओर पढ़ाने का अवसर नही चूकते है ।
सुरक्षा को लेकर आज जिस प्रकार निजी सुरक्षा एजेंसिया धनाढ्य कालोनियों सहित बड़े व्यवसायिक संस्थानों, बैंकों, निजी भवनों में सुरक्षा गार्ड लगाकर उनसे सुरक्षा की ज़िम्मेदारी पूरी कराती वे एजेंसी संचालक युवा बेरोजगारों को रोजगार देकर उनकी आधी से ज्यादा तनख़ाह हजम कर जाते है। कलेक्टर-पुलिस अधीक्षको सहित सभी जिम्मेदारों को पता होता है कि ये सुरक्षाकर्मी पढ़ाई कि डिग्रियों कि मूल प्रति इन्हे देकर नौकरी तो पा जाते है पर आखिर तक वे सुरक्षागार्ड के चक्रव्यूह से मुक्त नही हो पाते ओर डिग्रियों को इनसे प्राप्त करना इनका सपना भर रह जाता है तब आधी अधूरी तनख़ाह वाले ये युवा तंगी-लाचारी का जीवन जीते हुये हर तीज त्योहारों पर धनिक लोगों से फटा पुराना कपड़ा जूता, अन्य इनके लिए अनुपयोगी हो चुकी सामग्री मांगते है ताकि वे गरीबी में भी अपना ओर परिवार का निर्वाह कर सके। आईएनएस सुरक्षाकर्मी चौकीदार की तनकाह से उनकी बर्दी-जूते के दाम भी कटते है। इस रीति से पूरा वेतन भी नहीं हाथ आता और समय इनकी किस्मत पर थप्पड़ जड़ते रहता है जिससे ये अपनी माता, बहन, भाई सहित बुजुर्ग बीमार पिता आदि का भरण पोषण केवल अपनी कमाई से करना पड़ता है।
पुलिस अधीक्षक, कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर, आबकारी अधिकारी, आरटीओ, सांसद-विध्यक जैसे न जाने कितने अधिकारी व राजनैतिक ओर विभाग प्रमुख होते है जिनके बंगलों सहित निजी घरों में इनके ऑफिसों का 30 प्रतिशत कर्मचारी जो पुलिस –होमगार्ड या विभाग के तृतीय व चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी होते है जो इनके बंगलों पर बच्चों को खिलाने, स्कूल लाने ले जाने, खाना बनाने से लेकर सभी तरह की सेवाए देने को विवश होते है जिससे सरकार के एक बड़ा कर्मचारियों का भाग साहब की जी हजूरी में निकाल जाता है, इनमें स्वाभिमानी कर्मचारी तो बच निकलते है किन्तु कुछ तरक्की पाने, अफसरों को प्रसन्न रख अपना उल्लू सीधा करने तो कुछ लाचारी-बेवशी में खामोशी से यह सब सहते है । इन सभी को काम कम से कम दश घंटे करना चाहिए । ऊपर से अबसर पड़ने पर न दिन छुट्टी न रात छुट्टी ।
अपने उच्चाधिकारियों को खुश न रक्खें तो तरक्की कैसी? ठीक नौकरी हो जाए यह भी भय बना रहता है इसलिए सारे कर्मचारी अपने अधिकारी को खुश करने में लगे रहते है, जिनके लिए यह सेवा करना मुश्किल होती है उन्हे दिक्कत झेलना पड़ता है ? इस दशा में सर्वसाधारण को प्रसन्न करें कि अपनी उम्मीद की जड़ सीचे ? हाकिम और रईयत दोनों का खुश रखना बड़े भारी नीतिज्ञ का काम है न कि तीसरे-चौथे वर्ग के पियादे का यह काम है । और गृहस्थों के भ्रमजाल वह हैं जो बड़े-बड़े सेठ रईसों विद्वानों और बुद्धिमानों का मन डावां-डोल कर देते हैं यह बिचारनीय हैं तथा दुनिया का कायदा यह है कि सीधी तरह मुनासिव राशि (रिश्वत)की मांग करे पर वह नही मिलती है तब अगर कोई डर वा लालच दिखा के आडम्बर करके घुस देने आता हो तो मुनासिव की बात छोड़िए मनमाफिक रुपए मिला जाते है। निश्चित ही जब मन की कल्पना से बढ़कर ऊपरी आय हो जाये तो न्याय का विचार छुट जाएगा केवल काम निकालने के अलावा अन्य कोई बात फिर सूझती ही नहीं है।
विचार कीजिये आज कौन पुलिसवाला है जो जो वर्तमान की व्यवस्था से खुश है वह जिस स्थान पर जिस पुलिस थाने के मोहल्ले या वीट में उसकी सेवाए लगाई गई है वहाँ आम लोगों की सेवाए करेगा? कदापि नहीं उसे तो वहाँ से सारे गलत काम करने वाले सटोरिये, जुएवाज, कच्ची पक्की अवैध रूप से बेचने, जैसे कामों के अलावा कानून तोड़ने,क्षेत्र के लोगों को आतंकित करने वालों की सेवाए मिलने लगेगी तो किस बात का संकोच करेगा।पुलिस के आला अफसर को थोड़ी पता है की वह अपने क्षेत्र में कैसा काम कर रहा है, वह उस क्षेत्र के ऐसे लोगो को सलाम ठोकने जाएगा जो राजनीति में पावर रखते है जो शासन प्रशासन में दखल रकते है उनकी सिफ़ारिश या उनके दो बोल अधिकारियों तक इनके माध्यम से पहुच जाते है, अधिकारी संतुष्ट… कानून व्यवस्था की रोज मईयते निकलती है तो निकलती रहे किसे परवाह है।
महंगाई का जमाना है ओर अब सभी लोगों के महंगे शौक हो गए है। पुलिस आरक्षक से लेकर कोतवाल तक ही नही इसके आगे सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठे अधिकारी भी यह मानते है की उन्हे मिलने वाली तनखा से उनका पूरा नही होता है। अब इस नौकरी से जितनी सेवाए जनता की कर सकते है कर रहे है, पर सारी चीजें महंगी हैं और धन कम पड़ने लगा है। नौकरी के अलावा कोई व्यापार तो है नही जो रुपयों की बरसात हो , नौकरी के दौरान अगर कुछ बिना किए सार्थक हो रहा है और कही ना जाये, कुछ किए बिना , न करने के लिए कोई सेवा मिलने से महंगाई डायन से मुक्ति मिले तो इस न करने का लाभ लेने में किस ससुरे को तकलीफ है। जब अफसर न करने का लाभ ले रहे है, जिन्हे जनता की सेवा के लिए ऑफिस में काम करना चाहिए वे सभी कर्मचारी सेवा करने के कारण रिटायर होने तक मर खप के रह जाता है। जनता के रक्षक पुलिस इस तरह उनकी भक्षक बन जाती है तभी तो उन पर से जनता का विश्वास उठ गया है।
यदि सभी विभाग प्रमुख अपने वेतन से नए नौकरों को रखकर अपने बंगले और घरेलू सेवाएं कराने में सक्षम होते हुए भी यह न करे तो यह शोषण का प्रतीक नहीं माना जाएगा। ये अफसर बंगलों से हटाकर अपने ही विभागीय कर्मचारियों की कुंडली पर नाग की तरह बैठे ये उन्हे मिलने वाली तरक्की से वंचित रखते है वहीं फील्ड में उत्कृष्ट काम कर तरक्की पा सकने से उन्हें वंचित रखते है यह भी विचारणीय है। क्या अधिकारी गणों का मानवीय चेहरा सामने आ सकेगा जो छोटे दर्जे के पुलिस या अन्य कर्मचारियों द्वारा विभागों को दी जाने वाली सेवाओं को अपने बंगले- घर पर लेने के कलंक को धो सके, यदि ऐसा होता है तो निश्चित रूप से यह विभाग के लिए ही नही अपितु जनता के लिए भी हर्ष का विषय होगा और बंगलों की सेवाओं से मुक्त हुए कर्मचारी सच्चे मायने में आजाद हो सकेंगे?
आत्माराम यादव पीव चीफ एडिटर हिन्दसंतरीडाटकाम
ग्वालटोली,नर्मदापुरम मध्यप्रदेश मोबाइल 9993376616
